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डॉ. सचिन पाल

और उनके पिताश्री

थनैला रोग

गाय-भैंस में थन की सूजन और संक्रमण

🩺लक्षण पहचानें

• थन में सूजन और गर्माहट

• दूध में खून या मवाद

• दूध में दाने या झिल्ली

• दूध उत्पादन में कमी

• थन छूने पर दर्द

• बुखार (गंभीर मामलों में)

🔍मुख्य कारण

  • • गंदे और गीले फर्श पर रहना
  • • दूध निकालते समय साफ-सफाई की कमी
  • • जीवाणु संक्रमण
  • • थन में चोट या घाव
  • • अधूरा दूध निकालना

💊इलाज और दवाएं

दवा का नामप्रकारखुराकअवधि
मास्टिलेपथन में डालने वालीप्रभावित थन में १ सिरिंज३-५ दिन
टोपेंडथन में डालने वालीप्रभावित थन में १ सिरिंज३ दिन
जेंटामाइसिनइंजेक्शन५-१० मिली५ दिन
सेफ्टीओफरइंजेक्शन१ मिली प्रति ५० किलो३-५ दिन
मेलोनेक्सइंजेक्शन (दर्द निवारक)१०-१५ मिली३ दिन

🛡️बचाव कैसे करें

✓ दूध निकालने से पहले थन धोएं

✓ साफ और सूखा बिछावन रखें

✓ पूरा दूध निकालें

✓ दूध निकालने के बाद थन साफ करें

✓ नियमित थन की जांच करें

✓ सूखे पशु को थन में दवा दें

⚠️तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें यदि:

  • • तेज बुखार (१०४°F से ऊपर)
  • • थन में गलन या काला रंग
  • • पशु खाना-पीना बंद कर दे
  • • दूध में बदबू आए
  • • २ दिन में सुधार न हो

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मुंहपका-खुरपका रोग

अत्यधिक संक्रामक वायरल बीमारी - तुरंत इलाज जरूरी

🩺लक्षण पहचानें

• तेज बुखार (१०४-१०६°F)

• मुंह में छाले और लार गिरना

• खुरों में घाव और लंगड़ापन

• थन पर छाले

• खाना-पीना बंद करना

• दूध उत्पादन में भारी गिरावट

• मुंह चपचपाना और आवाज करना

• कमजोरी और सुस्ती

🔍मुख्य कारण

  • • वायरल संक्रमण (अत्यधिक संक्रामक)
  • • संक्रमित पशु के संपर्क में आना
  • • संक्रमित चारा या पानी
  • • हवा के माध्यम से फैलाव
  • • टीकाकरण न होना
  • • गंदगी और भीड़-भाड़ वाले स्थान

💊इलाज और दवाएं

दवा का नामप्रकारखुराकअवधि
मेलोनेक्सइंजेक्शन (बुखार)१५-२० मिली३-५ दिन
पैरासिटामोल बोलसगोली (बुखार)२-३ गोली३ दिन
ऑक्सीटेट्रासाइक्लिनइंजेक्शन (संक्रमण)१० मिली५ दिन
विटामिन बी-कॉम्प्लेक्सइंजेक्शन (ताकत)१० मिली५-७ दिन
ग्लिसरीन बोरेक्समुंह में लगाने कीदिन में २-३ बारजब तक ठीक हो
पोटाशियम परमैंगनेटखुर धोने कीपतला घोलरोज
कॉपर सल्फेटखुर में लगाने कीपाउडर या पेस्टरोज

🛡️बचाव कैसे करें

✓ नियमित टीकाकरण (साल में २ बार)

✓ संक्रमित पशु को अलग रखें

✓ साफ-सफाई का विशेष ध्यान

✓ नए पशु को अलग रखकर जांचें

✓ चारा-पानी साफ रखें

✓ बाहरी लोगों का आना-जाना कम करें

विशेष सावधानियां

  • • यह बीमारी बहुत तेजी से फैलती है
  • • संक्रमित पशु को तुरंत अलग करें
  • • उपयोग के बर्तन अलग रखें
  • • पशु चिकित्सा विभाग को सूचित करें
  • • मरे पशु को गहरा दबाएं या जलाएं
  • • टीकाकरण सबसे बेहतर बचाव है

⚠️तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें यदि:

  • • तेज बुखार (१०४°F से ऊपर)
  • • पशु बिल्कुल खाना-पीना बंद कर दे
  • • सांस लेने में दिक्कत हो
  • • दिल की धड़कन बहुत तेज हो
  • • पशु लड़खड़ाने लगे

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अफरा रोग (पेट फूलना)

पेट में गैस भरना - जानलेवा हो सकता है, तुरंत इलाज करें

🩺लक्षण पहचानें

• पेट का बायां हिस्सा फूलना

• बेचैनी और घबराहट

• बार-बार लेटना और उठना

• खाना-पीना बंद करना

• जुगाली न करना

• सांस लेने में तकलीफ

• पेट पर थपथपाने से ड्रम जैसी आवाज

• लार गिरना और मुंह से झाग

🔍मुख्य कारण

  • • अधिक हरा चारा खा लेना (खासकर बरसीम, लूसर्न)
  • • गीला या ओस वाला चारा खाना
  • • अधिक दाना या सड़ा हुआ चारा
  • • गेहूं का भूसा ज्यादा खा लेना
  • • पेट में किसी चीज का अटक जाना
  • • अचानक चारा बदलना

💊इलाज और दवाएं

दवा का नामप्रकारखुराकउपयोग
टिम्पोलतरल दवा१००-२०० मिलीगैस निकालने के लिए
ब्लोटोसिलतरल दवा१००-१५० मिलीगैस और अफरा दूर करने को
तारपीन का तेलतेल१००-२०० मिलीगैस निकालने और पाचन
सरसों का तेलतेल२५०-५०० मिलीपाचन तंत्र सुधारने को
पाचक चूर्णचूर्ण५०-१०० ग्रामपाचन सुधारने के लिए
मैग्नीशियम सल्फेटनमक२५०-५०० ग्रामपेट साफ करने के लिए

🏠घरेलू उपचार (हल्के अफरे में)

  • • सरसों का तेल २५० मिली मुंह में डालें
  • • हींग १०-२० ग्राम पानी में घोलकर पिलाएं
  • • अजवाइन ५० ग्राम पानी में उबालकर पिलाएं
  • • नीम की पत्ती पीसकर १०० ग्राम खिलाएं
  • • पशु को चलाते रहें (गैस निकलने में मदद)
  • • ठंडा पानी पेट पर डालें

🛡️बचाव कैसे करें

✓ हरा चारा धीरे-धीरे बढ़ाएं

✓ गीला या ओस वाला चारा न दें

✓ अचानक चारा न बदलें

✓ खाने से पहले सूखा चारा दें

✓ पानी हमेशा साफ रखें

✓ नियमित व्यायाम करवाएं

⚠️तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें यदि:

  • • पेट बहुत ज्यादा फूल गया हो
  • • सांस लेने में बहुत तकलीफ हो
  • • पशु गिरने लगे या बेहोश हो
  • • घरेलू इलाज से १-२ घंटे में आराम न हो
  • • मुंह नीला पड़ने लगे
  • • बहुत तेज बेचैनी हो

⚡ नोट: गंभीर अफरे में ट्रोकार से गैस निकालनी पड़ती है - यह सिर्फ डॉक्टर ही कर सकते हैं!

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प्रजनन समस्याएं

गर्मी न आना, रुका हुआ जेर, बांझपन का इलाज

🩺मुख्य समस्याएं

• गर्मी न आना (मद न आना)

• बार-बार गर्मी आना (गर्भ न ठहरना)

• रुका हुआ जेर (नाल न गिरना)

• गर्भपात हो जाना

• बच्चेदानी बाहर आना

• सफेद पानी आना (ल्यूकोरिया)

🔍मुख्य कारण

  • • कमजोरी और कुपोषण
  • • विटामिन और खनिज की कमी
  • • गर्भाशय में संक्रमण
  • • हार्मोन असंतुलन
  • • गलत समय पर गर्भाधान
  • • अंडाशय में सिस्ट (गांठ)
  • • ब्यांत के समय चोट लगना

💊इलाज और दवाएं

समस्यादवा का नामखुराकउपयोग
रुका हुआ जेरऑक्सीटोसिन इंजेक्शन२०-३० यूनिटजेर निकालने के लिए
गर्मी न आनाजीपीजी इंजेक्शनडॉक्टर के अनुसारहार्मोन संतुलन
गर्मी न आनापीजीएफ२अल्फा२ इंजेक्शन (११ दिन के अंतर पर)गर्मी लाने के लिए
संक्रमणसेफ्टीओफर इंजेक्शन१ मिली प्रति ५० किलोगर्भाशय संक्रमण
सफेद पानीमेट्रोनिडाजोल बोलसगर्भाशय में डालने कीसंक्रमण साफ करने को
कमजोरीकैल्शियम बोरोग्लूकोनेट४५० मिली (नस में)ताकत के लिए
पोषणमिनरल मिक्सचर५०-१०० ग्राम रोजविटामिन-खनिज पूर्ति

🔬कृत्रिम गर्भाधान (एआई) की सही जानकारी

  • सही समय: गर्मी शुरू होने के १२-१८ घंटे बाद
  • पहचान: पशु बेचैन हो, बार-बार पेशाब करे, दूसरे पशुओं पर चढ़े
  • दोहराना: अगर पहली बार गर्भ न ठहरे तो १२ घंटे बाद दोबारा
  • गुणवत्ता: अच्छी नस्ल का बीज चुनें
  • सफाई: गर्भाधान से पहले साफ-सफाई जरूरी

🛡️बचाव कैसे करें

✓ पौष्टिक आहार दें

✓ नियमित व्यायाम करवाएं

✓ मिनरल मिक्सचर नियमित दें

✓ साफ-सफाई का ध्यान रखें

✓ गर्मी का सही समय पहचानें

✓ प्रशिक्षित एआई तकनीशियन बुलाएं

⚠️तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें यदि:

  • • ब्यांत के २४ घंटे बाद भी जेर न गिरे
  • • गर्भाशय बाहर निकल आए
  • • बदबूदार स्राव आए
  • • तेज बुखार हो
  • • लगातार ३-४ बार गर्भ न ठहरे
  • • ६ महीने से ज्यादा गर्मी न आए

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लंगड़ापन और खुर रोग

खुरों में संक्रमण, घाव और लंगड़ापन का इलाज

🩺लक्षण पहचानें

• लंगड़ाकर चलना

• खुर में सूजन और गर्माहट

• खुरों से बदबू आना

• खुर में मवाद या खून

• पशु खड़े होने से मना करे

• बुखार (संक्रमण होने पर)

• खाना-पीना कम करना

• दूध उत्पादन में कमी

🔍मुख्य कारण

  • • गंदे और गीले फर्श पर रहना
  • • कीचड़ और गोबर में रहना
  • • खुरों की सफाई न करना
  • • कठोर या पथरीली जमीन पर चलना
  • • खुरों में पत्थर या कांटा चुभना
  • • जीवाणु संक्रमण (फुट रॉट)
  • • खुरों का अधिक बढ़ जाना

💊इलाज और दवाएं

दवा का नामप्रकारउपयोगअवधि
पोटाशियम परमैंगनेटघोल (धोने की)खुर धोने के लिएरोज २-३ बार
कॉपर सल्फेटपाउडर/पेस्टघाव में लगाने के लिएरोज १ बार
बोरिक एसिड पाउडरपाउडरखुर में छिड़कने के लिएरोज
आयोडीन टिंचरतरलघाव साफ करने के लिएरोज
ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन स्प्रेस्प्रेसंक्रमण रोकने के लिएरोज २ बार
पेनिसिलिन इंजेक्शनइंजेक्शनगंभीर संक्रमण में५ दिन
मेलोनेक्सइंजेक्शन (दर्द)दर्द और सूजन कम करने को३ दिन

🔧इलाज कैसे करें (कदम-दर-कदम)

  1. सफाई: पहले खुर को गुनगुने पानी से धोएं
  2. काटना: अगर खुर बढ़ गया हो तो काटें
  3. घाव साफ करें: पोटाशियम परमैंगनेट के घोल से धोएं
  4. दवा लगाएं: कॉपर सल्फेट या आयोडीन लगाएं
  5. पट्टी बांधें: साफ कपड़े से पट्टी करें
  6. सूखा रखें: पशु को सूखी जगह पर रखें
  7. रोज दोहराएं: जब तक ठीक न हो

🛡️बचाव कैसे करें

✓ फर्श सूखा और साफ रखें

✓ नियमित खुर की सफाई करें

✓ ६ महीने में खुर कटाई करें

✓ फुट बाथ (खुर नहाने का गड्ढा) बनाएं

✓ नियमित व्यायाम करवाएं

✓ पौष्टिक आहार दें (जिंक, बायोटिन)

🛁फुट बाथ कैसे बनाएं

  • • २-३ फीट लंबा और १ फीट चौड़ा गड्ढा बनाएं
  • • ६-८ इंच गहरा रखें
  • • कॉपर सल्फेट या फॉर्मेलिन का घोल भरें
  • • सप्ताह में २-३ बार पशुओं को इससे गुजारें
  • • हर १५ दिन में घोल बदलें

⚠️तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें यदि:

  • • खुर से खून बहुत ज्यादा बह रहा हो
  • • बदबू बहुत तेज हो
  • • पशु बिल्कुल खड़ा न हो पाए
  • • तेज बुखार हो
  • • ३-४ दिन में आराम न हो
  • • खुर का हिस्सा टूट गया हो

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पार्वो वायरस (कुत्तों में)

बहुत खतरनाक बीमारी - तुरंत इलाज जरूरी

🩺लक्षण पहचानें

• खूनी दस्त (बहुत बदबूदार)

• बार-बार उल्टी

• तेज बुखार

• खाना-पीना बंद

• बहुत कमजोरी

• पानी की कमी (डिहाइड्रेशन)

🔍मुख्य कारण

  • • वायरल संक्रमण (अत्यधिक संक्रामक)
  • • संक्रमित कुत्ते के मल से फैलता है
  • • पिल्लों में ज्यादा खतरा (२ माह से १ साल)
  • • टीकाकरण न होना
  • • कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता

💊इलाज और दवाएं

दवा का नामप्रकारखुराकउपयोग
आईवी ड्रिपतरल पदार्थडॉक्टर के अनुसारपानी की कमी पूरी करने को
मेट्रोनिडाजोलइंजेक्शन/गोली१० मिग्रा/किलोसंक्रमण रोकने के लिए
सेफ्ट्रियाक्सोनइंजेक्शन२० मिग्रा/किलोएंटीबायोटिक
ओंडानसेट्रोनइंजेक्शन०.५ मिग्रा/किलोउल्टी रोकने के लिए
ओआरएसघोलथोड़ा-थोड़ा बार-बारपानी की कमी के लिए

🛡️बचाव कैसे करें

✓ समय पर टीकाकरण (६, ९, १२ सप्ताह)

✓ पिल्लों को बाहर न ले जाएं (टीके से पहले)

✓ साफ-सफाई का ध्यान रखें

✓ संक्रमित कुत्तों से दूर रखें

⚠️तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें यदि:

  • • खूनी दस्त दिखे
  • • बार-बार उल्टी हो
  • • पिल्ला बहुत कमजोर हो गया
  • • पानी भी न पी पाए
  • • तेज बुखार हो

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टिक्स और पिस्सू

बाहरी परजीवी - खुजली और संक्रमण

🩺लक्षण पहचानें

• बहुत खुजली होना

• बाल झड़ना

• त्वचा पर लाल दाने

• टिक्स दिखाई देना

• काले दाने जैसे पिस्सू

• कमजोरी (खून चूसने से)

💊इलाज और दवाएं

दवा का नामप्रकारखुराकउपयोग
फिप्रोनिल स्प्रेस्प्रेपूरे शरीर परटिक्स-पिस्सू मारने को
आइवरमेक्टिनइंजेक्शन०.२ मिग्रा/किलोटिक्स इलाज
एक्टिवेट टिक कॉलरकॉलरगले में पहनाएंबचाव के लिए
सिमपारिका गोलीगोलीमहीने में १ बारटिक्स-पिस्सू रोकथाम
परमेथ्रिन शैंपूशैंपूसप्ताह में १ बारनहलाने के लिए

🛡️बचाव कैसे करें

✓ नियमित टिक कॉलर पहनाएं

✓ महीने में १ बार दवा दें

✓ घास और झाड़ियों से दूर रखें

✓ घर में साफ-सफाई रखें

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त्वचा रोग (खुजली और फंगल)

त्वचा संक्रमण और एलर्जी का इलाज

🩺लक्षण पहचानें

• लगातार खुजली

• गोल-गोल गंजे पैच

• त्वचा लाल और सूजी हुई

• बाल झड़ना

• त्वचा से बदबू

• पपड़ी या पपड़ी जैसी त्वचा

🔍मुख्य कारण

  • • फंगल इन्फेक्शन (रिंगवर्म)
  • • एलर्जी (खाने से या वातावरण से)
  • • बैक्टीरियल संक्रमण
  • • घुन (माइट्स) का संक्रमण
  • • कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता

💊इलाज और दवाएं

दवा का नामप्रकारखुराकउपयोग
केटोकोनाजोल शैंपूशैंपूसप्ताह में २ बारफंगल इन्फेक्शन
आइट्राकोनाजोलगोली५ मिग्रा/किलोगंभीर फंगल इन्फेक्शन
एपोक्वेलगोली०.४-०.६ मिग्रा/किलोखुजली और एलर्जी
प्रेडनिसोलोनगोली०.५ मिग्रा/किलोसूजन कम करने को
सेफालेक्सिनगोली१५-३० मिग्रा/किलोबैक्टीरियल संक्रमण

🛡️बचाव कैसे करें

✓ नियमित नहलाना

✓ सूखा और साफ रखें

✓ पौष्टिक आहार दें

✓ एलर्जी वाले खाने से बचें

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हेयरबॉल्स (बाल गांठ)

बिल्लियों में बाल उल्टी की समस्या

🩺लक्षण पहचानें

• बार-बार उल्टी करने की कोशिश

• बाल की गांठ उल्टी में

• कब्ज या दस्त

• खाना कम खाना

• खांसी जैसी आवाज

• पेट फूलना

🔍मुख्य कारण

  • • खुद को चाटने से बाल निगलना
  • • लंबे बालों वाली नस्लें
  • • बहुत ज्यादा चाटना (तनाव या त्वचा रोग)
  • • कम फाइबर वाला खाना

💊इलाज और दवाएं

दवा का नामप्रकारखुराकउपयोग
लैक्सेटोन पेस्टपेस्ट२-३ सेमी रोजबाल बाहर निकालने को
पेट्रोलियम जेलीजेली१ चम्मच सप्ताह में २ बारबाल फिसलाने के लिए
हाई फाइबर फूडविशेष खानारोजपाचन सुधारने को
हेयरबॉल कंट्रोल फूडविशेष खानारोजबाल गांठ रोकने को

🛡️बचाव कैसे करें

✓ रोज ब्रश करें (खासकर लंबे बाल वाली)

✓ हाई फाइबर खाना दें

✓ खूब पानी पिलाएं

✓ सप्ताह में २ बार लैक्सेटोन पेस्ट

⚠️तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें यदि:

  • • बिल्कुल खाना-पीना बंद कर दे
  • • कई दिनों से कब्ज हो
  • • पेट बहुत फूल गया हो
  • • बार-बार उल्टी करे लेकिन कुछ न निकले

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किडनी (गुर्दे) की बीमारी

बुजुर्ग बिल्लियों में आम समस्या

🩺लक्षण पहचानें

• बहुत ज्यादा पानी पीना

• बार-बार पेशाब करना

• भूख न लगना

• वजन घटना

• उल्टी होना

• कमजोरी और सुस्ती

• मुंह से बदबू

• बाल रूखे और बेजान

🔍मुख्य कारण

  • • उम्र बढ़ना (७ साल से ऊपर)
  • • संक्रमण
  • • पानी कम पीना
  • • अनुवांशिक कारण
  • • जहरीले पदार्थ

💊इलाज और दवाएं

दवा का नामप्रकारखुराकउपयोग
रेनल डाइटविशेष खानारोजकिडनी पर बोझ कम करने को
फ्लूइड थेरेपीसबकट इंजेक्शनडॉक्टर के अनुसारपानी की कमी पूरी करने को
एसिड न्यूट्रलाइजरगोलीरोजपेट की एसिडिटी कम करने को
फॉस्फेट बाइंडरगोलीखाने के साथफॉस्फेट कम करने को
ब्लड प्रेशर दवागोलीडॉक्टर के अनुसारबीपी नियंत्रण

🍽️खाने में ध्यान दें

  • • कम प्रोटीन वाला खाना
  • • कम नमक
  • • कम फॉस्फोरस
  • • ओमेगा-३ फैटी एसिड
  • • खूब पानी पिलाएं

🛡️बचाव कैसे करें

✓ खूब पानी पिलाएं

✓ गुणवत्ता वाला खाना दें

✓ नियमित चेकअप (७ साल के बाद)

✓ वजन नियंत्रित रखें

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सर्दी-जुकाम (श्वसन संक्रमण)

बिल्लियों में नाक-गला संक्रमण

🩺लक्षण पहचानें

• बार-बार छींकना

• नाक से पानी या मवाद

• आंखों से पानी आना

• खाना-पीना कम करना

• बुखार और सुस्ती

• सांस लेने में आवाज

🔍मुख्य कारण

  • • वायरल संक्रमण (फेलाइन हर्पीस, कैलिसी वायरस)
  • • कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता
  • • ठंड और नमी
  • • संक्रमित बिल्ली के संपर्क में आना
  • • टीकाकरण न होना

💊इलाज और दवाएं

दवा का नामप्रकारखुराकउपयोग
डॉक्सीसाइक्लिनगोली/सिरप५ मिग्रा/किलोएंटीबायोटिक
एल-लाइसिनपाउडर/पेस्ट२५०-५०० मिग्रा रोजरोग प्रतिरोधक बढ़ाने को
आई ड्रॉपबूंदेंदिन में ३-४ बारआंखों के लिए
स्टीम थेरेपीघरेलूदिन में २-३ बारनाक खोलने के लिए
विटामिन सप्लीमेंटसिरपडॉक्टर के अनुसारताकत बढ़ाने को

🛡️बचाव कैसे करें

✓ समय पर टीकाकरण

✓ गर्म और सूखी जगह रखें

✓ पौष्टिक आहार दें

✓ संक्रमित बिल्लियों से दूर रखें

⚠️तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें यदि:

  • • बिल्कुल खाना-पीना बंद कर दे
  • • सांस लेने में बहुत तकलीफ हो
  • • तेज बुखार हो
  • • ३-४ दिन में सुधार न हो

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पी.पी.आर (छोटे मवेशियों की प्लेग)

बीमारी के बारे में:

पी.पी.आर एक तीव्र वायरल रोग है जो मुख्य रूप से भेड़ और बकरियों को प्रभावित करता है । इस बीमारी में मृत्यु दर 80-100% तक हो सकती है । यह मॉर्बिलीवायरस परिवार का वायरस है जो खसरा और कुत्तों के डिस्टेंपर वायरस से संबंधित है।

लक्षण:

  • अचानक तेज बुखार (104-106°फारेनहाइट)
  • नाक और आँखों से गाढ़ा पानी बहना
  • मुँह, होंठ और जीभ में छाले और घाव
  • गंभीर दस्त (हरे-भूरे रंग का, कभी खूनी)
  • साँस लेने में तकलीफ और खाँसी
  • नाक से बदबूदार बलगम निकलना
  • भूख पूरी तरह बंद हो जाना
  • तेजी से कमजोर होना और वजन घटना
  • गर्भपात हो सकता है

रोग का फैलाव:

बीमार जानवरों के स्राव और मल-मूत्र से यह रोग फैलता है । भीड़भाड़ वाली जगहों पर तेजी से फैलता है। संक्रमित जानवरों के साँस के जरिए वायरस स्वस्थ जानवरों में प्रवेश करता है ।

निदान:

लक्षणों के आधार पर प्रारंभिक निदान किया जाता है । पुष्टि के लिए पीसीआर टेस्ट और एलिसा टेस्ट किया जाता है। खून, लिम्फ नोड्स और टॉन्सिल की जाँच की जाती है।

उपचार और बचाव

महत्वपूर्ण: पी.पी.आर का कोई सीधा इलाज नहीं है । केवल सहायक उपचार दिया जाता है।

दवाइयाँ और इलाज:

१. एंटीबायोटिक (द्वितीयक संक्रमण रोकने के लिए):

  • ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन (टेरामाइसिन/एलए-200) - 20 मिग्रा प्रति किलो शरीर भार , मांसपेशी में इंजेक्शन, दिन में एक बार 5-7 दिन तक
  • टाइलोसिन - भेड़-बकरी में उपयोगी पाया गया , 10 मिग्रा प्रति किलो, दिन में एक बार
  • पेनिसिलिन + स्ट्रेप्टोमाइसिन - संयुक्त इंजेक्शन, निमोनिया रोकने के लिए

२. द्रव चिकित्सा (डीहाइड्रेशन के लिए):

  • शरीर के द्रव संतुलन को बहाल करने के लिए तरल पदार्थ चिकित्सा आवश्यक है
  • ग्लूकोज सैलाइन - नस में या त्वचा के नीचे, 500 मिली-1 लीटर प्रतिदिन
  • ओआरएस घोल - मुँह से पिलाएँ
  • रिंगर लैक्टेट - गंभीर डीहाइड्रेशन में

३. आंत्र शामक (दस्त रोकने के लिए):

  • मेट्रोनिडाजोल - 10 मिग्रा प्रति किलो शरीर भार, दिन में एक बार
  • सल्फाडिमिडीन - 100 मिग्रा प्रति किलो, पहले दिन, फिर 50 मिग्रा प्रति किलो
  • लेवामिसोल 1.5% - कीड़ों के लिए

४. विटामिन और सहायक दवाएँ:

  • विटामिन बी-कॉम्प्लेक्स - ऊर्जा और रिकवरी के लिए आवश्यक
  • विटामिन ए और डी - इंजेक्शन रूप में
  • मल्टीमिनरल सप्लीमेंट - कमजोरी दूर करने के लिए
  • बुखार की दवा - पैरासिटामोल या मेलोक्सिकैम

५. मुँह के घावों का उपचार:

  • नींबू और संतरे के रस से घाव धोना प्रभावी पाया गया है
  • पोटाश या बोरिक एसिड का घोल (1% घोल में)
  • ग्लिसरीन + टिंचर आयोडीन
  • एंटीसेप्टिक स्प्रे (बीटाडीन)

देखभाल और प्रबंधन:

  • गर्म और ड्राफ्ट-मुक्त जगह में रखें, अच्छी फीडिंग और नर्सिंग जरूरी है
  • बीमार जानवर को तुरंत अलग कर दें
  • नरम, पौष्टिक चारा दें
  • ताजा, साफ पानी हमेशा उपलब्ध रखें
  • शेड की नियमित सफाई और कीटाणुनाशक का छिड़काव करें

बचाव (सबसे महत्वपूर्ण):

  • पी.पी.आर का टीका सबसे प्रभावी बचाव है
  • टीकाकरण कार्यक्रम: हर साल एक बार पी.पी.आर वैक्सीन लगवाएँ
  • 3-4 महीने की उम्र में पहला टीका
  • नए जानवर को 15-20 दिन अलग रखें
  • बीमारी के प्रकोप वाले क्षेत्र से जानवर न खरीदें
  • मेलों और बाजारों से लाए जानवरों की विशेष निगरानी
  • पशु चिकित्सा अधिकारियों को तुरंत सूचित करें यदि पी.पी.आर के लक्षण दिखें

याद रखें: पी.पी.आर से बचाव ही सबसे अच्छा उपाय है। नियमित टीकाकरण जरूर कराएँ। 2030 तक इस बीमारी को पूरी तरह खत्म करने का वैश्विक लक्ष्य है ।

खुरपका-मुँहपका रोग (एफएमडी)

बीमारी के बारे में:

यह एक गंभीर, अत्यधिक संक्रामक वायरल रोग है जो मुख्य रूप से गाय और सूअर को प्रभावित करता है, लेकिन भेड़-बकरी में भी होता है । वयस्क भेड़-बकरी में यह अक्सर हल्का या बिना लक्षण के होता है, लेकिन बच्चों में गंभीर हो सकता है ।

लक्षण:

  • बुखार (2-6 दिन तक रहता है)
  • मुँह, जीभ और होंठों पर छाले
  • खुरों के बीच, एड़ी और थनों पर छाले
  • लंगड़ापन (पहला लक्षण)
  • अधिक लार टपकना
  • खाना-पीना बंद हो जाना
  • दूध उत्पादन में अचानक गिरावट
  • युवा जानवरों में मृत्यु दर 20% या अधिक हो सकती है

रोग का फैलाव:

बीमार जानवरों के स्राव, दूध, वीर्य और चारे के माध्यम से फैलता है। वायरस हवा के जरिए भी फैल सकता है । संक्रमित उपकरण, वाहन, कपड़े और चारे से भी फैलता है । भेड़-बकरी 3-8 दिन में बीमारी दिखाती हैं ।

निदान:

लंगड़ापन और छालों को ध्यान से देखने पर पता चलता है । आरटी-पीसीआर टेस्ट और एंटीजन एलिसा से पुष्टि होती है । भारत में यह रोग सूचित करना अनिवार्य है।

उपचार और बचाव

महत्वपूर्ण: एफएमडी का कोई सीधा इलाज नहीं है। केवल सहायक उपचार और दर्द निवारक दी जाती हैं।

दवाइयाँ और इलाज:

१. एंटीबायोटिक (द्वितीयक संक्रमण रोकने के लिए):

  • ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन (टेरामाइसिन एलए-200) - 10-20 मिग्रा प्रति किलो, मांसपेशी या नस में, दिन में एक बार 5 दिन
  • पेनिसिलिन-स्ट्रेप्टोमाइसिन - संक्रमण रोकने के लिए
  • सेफ्टियोफर (नैक्सेल) - 2.2 मिग्रा प्रति किलो, दिन में एक बार 3-5 दिन

२. दर्द निवारक और सूजन कम करने वाली:

  • मेलोक्सिकैम - 0.5 मिग्रा प्रति किलो, दिन में एक बार
  • फ्लूनिक्सिन (बैनामाइन) - 2.2 मिग्रा प्रति किलो

३. मुँह और खुर के घावों का उपचार:

  • पोटाश या बोरिक एसिड का घोल (1-2% घोल) से मुँह धोएँ
  • ग्लिसरीन + टिंचर आयोडीन (1:1) घावों पर लगाएँ
  • खुरों को जिंक सल्फेट के घोल (5-10%) से साफ करें
  • एंटीसेप्टिक स्प्रे (बीटाडीन) लगाएँ
  • कॉपर सल्फेट पाउडर (नील थोथा) खुरों में भरें

४. सहायक देखभाल:

  • ग्लूकोज सैलाइन ड्रिप (कमजोरी में)
  • विटामिन बी-कॉम्प्लेक्स और सी इंजेक्शन
  • नरम, पौष्टिक चारा (घास को बारीक काटकर)
  • ताजा, साफ पानी हमेशा उपलब्ध रखें

देखभाल और प्रबंधन:

  • बीमार जानवर को तुरंत अलग करें (क्वारंटीन में)
  • कीटाणुनाशक जैसे आयोडीन या फिनाइल से शेड की सफाई करें
  • मुलायम बिस्तर और सूखी जगह दें
  • सभी उपकरणों को कीटाणुरहित करें
  • जानवरों का आवागमन बंद करें

बचाव (सबसे महत्वपूर्ण):

  • टीकाकरण: हर 6 महीने में एफएमडी का टीका लगवाएँ (सभी सात प्रकारों के खिलाफ प्रभावी नहीं होता)
  • नए जानवर को 21 दिन अलग रखें
  • प्रकोप वाले क्षेत्र से जानवर न लाएँ
  • बाहरी लोगों और वाहनों का प्रवेश सीमित करें
  • जूतों और उपकरणों को कीटाणुरहित करें
  • संदिग्ध मामलों की तुरंत रिपोर्ट करें

याद रखें: यह अत्यधिक संक्रामक बीमारी है। संदेह होने पर तुरंत पशु चिकित्सा अधिकारियों को सूचित करें । टीकाकरण ही सबसे अच्छा बचाव है।

पेट के कीड़े (गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल परजीवी)

बीमारी के बारे में:

पेट के कीड़े भेड़-बकरी में सबसे बड़ी समस्या हैं, जो मृत्यु और उत्पादन में कमी का प्रमुख कारण हैं । बारबर पोल वर्म या हेमोनकस कॉन्टोर्टस सबसे खतरनाक परजीवी है । दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र में कम से कम 48% फार्मों पर कीड़े सभी प्रकार की दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो चुके हैं ।

लक्षण:

  • वजन न बढ़ना या लगातार घटना
  • खुरदरा, बेजान और मुर्झाया हुआ बाल
  • पलकों का रंग सफेद होना (एनीमिया का संकेत - फैमाचा स्कोर 3 से ज्यादा)
  • दस्त या कब्ज
  • पेट फूला हुआ और "बॉटल जॉ" (जबड़े के नीचे सूजन)
  • कमजोरी, सुस्ती और भूख न लगना
  • युवा जानवरों में विकास रुकना
  • गंभीर मामलों में अचानक मौत

कीड़ों के प्रकार:

  • बारबर पोल वर्म (हेमोनकस) - रक्तचूषक, सबसे खतरनाक
  • ब्राउन स्टोमक वर्म - पेट में रहता है
  • आंत के कीड़े - दस्त का कारण
  • फेफड़ों के कीड़े - खाँसी और साँस की तकलीफ
  • टेपवर्म (फीताकृमि) - कम नुकसान देता है

निदान:

मल परीक्षण (एफईसी - फीकल एग काउंट) करवाएँ। प्रभावी इलाज के लिए 95% या अधिक अंडे कम होने चाहिए । फैमाचा स्कोरिंग सिस्टम से पलकों का रंग देखें (1-5 स्कोर)।

उपचार और बचाव

महत्वपूर्ण: अपने फार्म पर कौन सी दवा प्रभावी है, यह जानना जरूरी है। कई जगहों पर कीड़े दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो चुके हैं ।

कृमिनाशक दवाइयाँ:

१. बेंजिमिडाजोल समूह ("सफेद दवाएँ"):

  • फेनबेंडाजोल (सेफगार्ड, पैनाकर) - 10 मिग्रा प्रति किलो, मुँह से दें। 12-24 घंटे उपवास रखें, फिर दो खुराक 24 घंटे के अंतर पर । मांस के लिए 16 दिन, दूध के लिए 4 दिन इंतजार करें।
  • एल्बेंडाजोल (वैल्बाजेन) - 20 मिग्रा प्रति किलो, मुँह से । गर्भवती में मत दें। टेपवर्म और लीवर फ्लूक पर भी काम करता है। मांस के लिए 9 दिन, दूध के लिए 7 दिन इंतजार करें।
  • नोट: यह सबसे पुराना समूह है और इसमें प्रतिरोध सबसे ज्यादा है

२. मैक्रोसाइक्लिक लैक्टोन्स:

  • आइवरमेक्टिन (आइवोमेक ड्रेंच) - 0.4 मिग्रा प्रति किलो, मुँह से । भेड़ वाला ड्रेंच इस्तेमाल करें, इंजेक्शन वाला नहीं। मांस के लिए 14 दिन, दूध के लिए 9 दिन इंतजार करें।
  • मोक्सीडेक्टिन (साइडेक्टिन ड्रेंच) - 0.4 मिग्रा प्रति किलो, मुँह से। सिर्फ भेड़ का ओरल ड्रेंच इस्तेमाल करें । मांस के लिए 23 दिन, दूध के लिए 60 दिन इंतजार करें।
  • नोट: मोक्सीडेक्टिन में प्रतिरोध तेजी से बढ़ रहा है क्योंकि यह आइवरमेक्टिन जैसा ही है

३. इमिडाजोथियाजोल (सबसे प्रभावी):

  • लेवामिसोल (प्रोहिबिट, लेवासोल, ट्रैमिसोल) - 12 मिग्रा प्रति किलो, मुँह से । मध्य-अटलांटिक क्षेत्र के अधिकांश फार्मों पर यह सबसे प्रभावी है । वजन ध्यान से नापें। मांस के लिए 10 दिन, दूध के लिए 4 दिन इंतजार करें।
  • मोरान्टेल (रुमाटेल) - 10 मिग्रा प्रति किलो । चारे में मिलाकर दें। मांस के लिए 30 दिन, दूध के लिए कोई प्रतीक्षा नहीं।

४. विशेष दवाएँ:

  • क्लोसैन्टेल - बारबर पोल वर्म के लिए विशेष रूप से प्रभावी
  • प्राजिक्वांटेल - टेपवर्म के लिए

महत्वपूर्ण सावधानियाँ:

  • भेड़-बकरी दवाओं को जल्दी मेटाबोलाइज करते हैं, इसलिए खुराक गायों से ज्यादा चाहिए
  • गाय के पोर-ऑन (त्वचा पर लगाने वाले) कभी मत इस्तेमाल करें
  • जानवर का सही वजन नापकर ही दवा दें
  • 12-24 घंटे उपवास रखने से दवा ज्यादा प्रभावी होती है
  • गर्भवती जानवरों में कुछ दवाएँ सुरक्षित नहीं हैं
  • मांस और दूध की प्रतीक्षा अवधि जरूर मानें

बचाव और प्रबंधन:

  • चयनात्मक डीवर्मिंग: सिर्फ उन्हीं जानवरों को दवा दें जिन्हें जरूरत है (फैमाचा स्कोर 3 से ज्यादा)
  • घुमाव चराई: चरागाह को बदल-बदलकर चराएँ (2-3 सप्ताह के बाद)
  • गीली और दलदली जगह से बचें
  • साफ पानी और चारा दें (जमीन से ऊपर)
  • नए जानवर को 14 दिन अलग रखें और डीवर्मिंग करके ही झुंड में मिलाएँ
  • अधिक भीड़ न रखें
  • पौष्टिक आहार दें (प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए)
  • एक ही दवा बार-बार मत दें, प्रतिरोध बढ़ता है

याद रखें: पहले फीकल एग काउंट टेस्ट करवाएँ और देखें कि आपके फार्म पर कौन सी दवा काम कर रही है । अंधाधुंध डीवर्मिंग न करें, इससे प्रतिरोध बढ़ता है। पशु चिकित्सक की सलाह लें।

निमोनिया (फेफड़ों का संक्रमण)

बीमारी के बारे में:

निमोनिया मुख्य रूप से पास्चुरेला मल्टोसिडा और माइकोप्लाज्मा बैक्टीरिया से होता है। ठंड, नमी, भीड़भाड़ और खराब हवादार शेड में यह तेजी से फैलता है। युवा और कमजोर जानवर ज्यादा प्रभावित होते हैं।

लक्षण:

  • तेज बुखार (104-106°F)
  • लगातार खाँसी और छींक
  • साँस तेज-तेज और मुश्किल से लेना
  • नाक से गाढ़ा बलगम (पीला या हरा)
  • आँखों से पानी आना
  • भूख पूरी तरह बंद हो जाना
  • कमजोरी, सुस्ती और अलग-थलग रहना
  • मुँह से साँस लेना
  • गंभीर मामलों में मृत्यु (2-4 दिन में)

कारण:

  • बैक्टीरियल: पास्चुरेला, माइकोप्लाज्मा
  • वायरल: पी.आई-3, आरएसवी
  • ठंड और नमी में अचानक बदलाव
  • खराब हवादार और गंदे शेड
  • अमोनिया गैस से जलन
  • तनाव (परिवहन, दुधारू होना)

निदान:

लक्षणों के आधार पर। स्टेथोस्कोप से फेफड़ों में घरघराहट सुनाई देती है। एक्स-रे से पुष्टि होती है। नाक के स्वैब से बैक्टीरिया कल्चर किया जा सकता है।

उपचार और बचाव

महत्वपूर्ण: निमोनिया में तुरंत इलाज शुरू करना जरूरी है। ओक्सीटेट्रासाइक्लिन और एनरोफ्लॉक्सासिन दोनों प्रभावी हैं। देरी से जान जा सकती है।

दवाइयाँ और इलाज:

१. एंटीबायोटिक (प्रथम पंक्ति):

  • ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन एलए (टेरामाइसिन, बायोमाइसिन) - 20 मिग्रा प्रति किलो, मांसपेशी में, दिन में एक बार 5-7 दिन तक
  • एनरोफ्लॉक्सासिन (बेट्रिल) - 5-10 मिग्रा प्रति किलो, दिन में एक बार 3-5 दिन
  • टुलाथ्रोमाइसिन (ड्रैक्सिन) - 2.5 मिग्रा प्रति किलो, त्वचा के नीचे, एक ही खुराक
  • फ्लोरफेनिकॉल (न्यूफ्लोर) - 20 मिग्रा प्रति किलो, दिन में दो बार 3-5 दिन

२. द्वितीय पंक्ति एंटीबायोटिक (गंभीर मामलों में):

  • सेफ्टियोफर (नैक्सेल, एक्सीड) - 1-2 मिग्रा प्रति किलो, दिन में एक बार 5 दिन
  • पेनिसिलिन जी (प्रोकेन) - 22,000 यूनिट प्रति किलो, दिन में दो बार
  • टिल्मिकोसिन (माइकोटिल) - केवल त्वचा के नीचे

३. सहायक दवाएँ:

  • बुखार और दर्द निवारक: मेलोक्सिकैम (0.5 मिग्रा प्रति किलो) या फ्लूनिक्सिन (2.2 मिग्रा प्रति किलो)
  • खाँसी की दवा: ब्रोम्हेक्सिन या एम्ब्रोक्सॉल सिरप
  • ब्रोन्कोडायलेटर: एमिनोफिलिन
  • विटामिन इंजेक्शन: विटामिन ए, डी और ई
  • विटामिन सी: 500 मिग्रा, दिन में एक बार

४. द्रव चिकित्सा:

  • ग्लूकोज सैलाइन (5-10%) - 500 मिली-1 लीटर, नस में या त्वचा के नीचे
  • मल्टीविटामिन ड्रिप के साथ

देखभाल और प्रबंधन:

  • गर्म, सूखी और हवादार जगह में रखें
  • ठंडी हवा से बचाएँ
  • बीमार जानवर को अलग रखें
  • भाप देने से राहत मिलती है
  • छाती पर मालिश करें
  • नरम, पौष्टिक और गर्म चारा दें
  • गुनगुना पानी पिलाएँ
  • तनाव से बचाएँ

बचाव (सबसे महत्वपूर्ण):

  • टीकाकरण: पास्चुरेला और माइकोप्लाज्मा के खिलाफ टीका (साल में दो बार)
  • शेड में अच्छी हवा का प्रबंध
  • ठंड और बरसात में विशेष देखभाल
  • भीड़भाड़ न रखें (प्रति जानवर 3-4 वर्ग मीटर जगह)
  • शेड की नियमित सफाई और कीटाणुनाशक का छिड़काव
  • अमोनिया गैस जमा न होने दें
  • नए जानवर को क्वारंटीन में रखें
  • पौष्टिक आहार और साफ पानी
  • तनाव कम करें
  • कमजोर और युवा जानवरों का विशेष ध्यान

याद रखें: निमोनिया में समय पर इलाज बहुत जरूरी है। 24-48 घंटे की देरी जानलेवा हो सकती है। लंबे समय तक काम करने वाले ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन सबसे अच्छी पसंद है। पशु चिकित्सक से तुरंत संपर्क करें।

कॉलिक (पेट दर्द) - घोड़ा

बीमारी के बारे में:

कॉलिक घोड़ों में पेट दर्द की एक गंभीर स्थिति है जो पाचन तंत्र की विभिन्न समस्याओं से उत्पन्न होती है। यह घोड़ों में मृत्यु का एक प्रमुख कारण है। आंत में रुकावट, गैस, मरोड़ या सूजन के कारण होता है।

लक्षण:

  • पेट में दर्द के कारण बेचैनी और घूमना
  • बार-बार जमीन पर लेटना और उठना
  • पेट की तरफ पैर से लात मारना
  • जमीन पर लोटना या पलटने की कोशिश
  • पसीना आना और तेज सांस लेना
  • खाना-पीना बंद कर देना
  • मल त्याग न होना या कम होना
  • पेट फूलना या सख्त होना
  • नाड़ी तेज होना (सामान्य 28-44 प्रति मिनट से अधिक)

कारण:

  • अचानक आहार में बदलाव
  • खराब गुणवत्ता का चारा या दाना
  • पानी की कमी या पानी न पीना
  • आंतों में रेत या मिट्टी जमा होना
  • परजीवी संक्रमण (कीड़े)
  • आंत में मरोड़ या रुकावट
  • अधिक मात्रा में दाना खाना
  • तनाव या अचानक गतिविधि में परिवर्तन

निदान:

  • लक्षणों की जांच और व्यवहार का अवलोकन
  • पेट की आवाज सुनना (स्टेथोस्कोप)
  • नाड़ी, तापमान और श्वसन दर की जांच
  • मलाशय की जांच (रेक्टल एग्जामिनेशन)
  • नासोगैस्ट्रिक ट्यूब से पेट की जांच
  • अल्ट्रासाउंड या एक्स-रे (गंभीर मामलों में)

उपचार और बचाव

⚠️ महत्वपूर्ण: कॉलिक एक आपातकालीन स्थिति है। तुरंत पशु चिकित्सक को बुलाएं। देरी जानलेवा हो सकती है।

दवाइयाँ और इलाज:

१. दर्द निवारक (एनाल्जेसिक):

  • फ्लूनिक्सिन मेग्लूमीन (बैनामाइन) - 1.1 mg/kg शरीर भार, IV या IM, हर 12 घंटे में
  • डिटोमिडीन (डोर्मोसेडान) - 0.01-0.02 mg/kg, IV, दर्द और बेचैनी कम करने के लिए
  • ब्यूटोर्फानोल - 0.01-0.04 mg/kg, IV, गंभीर दर्द में
  • ब्रांड: Banamine (Merck), Prevail, Finadyne

२. आंत की गति बढ़ाने वाली दवा:

  • मेटोक्लोप्रामाइड - 0.25 mg/kg, IV, हर 6-8 घंटे
  • लिडोकेन - 1.3 mg/kg IV बोलस, फिर 0.05 mg/kg/min निरंतर
  • नियोस्टिगमीन - 0.004-0.02 mg/kg, SC (सावधानी से)
  • ये दवाएं आंत की सामान्य गति बहाल करने में मदद करती हैं

३. द्रव चिकित्सा (फ्लूइड थेरेपी):

  • लैक्टेटेड रिंगर सॉल्यूशन - IV, 40-80 ml/kg/hour
  • नॉर्मल सैलाइन (0.9% NaCl) - IV, शरीर के द्रव संतुलन के लिए
  • हाइपरटॉनिक सैलाइन (7.2%) - 4 ml/kg IV (सदमे में)
  • पेट में तरल पदार्थ देने के लिए नासोगैस्ट्रिक ट्यूब का उपयोग

४. जुलाब और स्मूदक:

  • मिनरल ऑयल - 2-4 लीटर, नासोगैस्ट्रिक ट्यूब से
  • मैग्नीशियम सल्फेट (एप्सम साल्ट) - 0.5-1 kg, पानी में घोलकर
  • साइलियम (इसबगोल) - रेत या मिट्टी वाली रुकावट में उपयोगी
  • डायोक्टाइल सोडियम सल्फोसक्सिनेट (DSS) - मल को नरम करने के लिए

५. एंटीबायोटिक्स (संक्रमण रोकने के लिए):

  • पेनिसिलिन - 22,000 IU/kg, IV या IM, हर 6 घंटे
  • जेंटामाइसिन - 6.6 mg/kg, IV, दिन में एक बार
  • सेफ्टियोफर - 2.2-4.4 mg/kg, IV या IM, दिन में दो बार
  • आंत के टूटने या गंभीर संक्रमण के खतरे में उपयोग

६. सर्जिकल उपचार:

  • आंत में मरोड़ (टॉर्शन) या गंभीर रुकावट में सर्जरी आवश्यक
  • 24 घंटे में सुधार न होने पर ऑपरेशन की जरूरत
  • समय पर सर्जरी से जीवन बचाया जा सकता है

तत्काल प्राथमिक उपचार (पशु चिकित्सक आने तक):

  • घोड़े को धीरे-धीरे चलाएं (लेकिन थकाएं नहीं)
  • खाना-पानी तुरंत बंद कर दें
  • लोटने से रोकने की कोशिश करें (चोट से बचाव)
  • घोड़े को शांत और सुरक्षित जगह पर रखें
  • नाड़ी, सांस और तापमान नोट करें

बचाव के उपाय:

  • नियमित और संतुलित आहार दें, अचानक बदलाव न करें
  • ताजा और साफ पानी हमेशा उपलब्ध रखें
  • उच्च गुणवत्ता का चारा और दाना दें
  • नियमित व्यायाम और चरने का समय दें
  • हर 2-3 महीने में कृमिनाशक दवा दें
  • दांतों की नियमित जांच करवाएं
  • तनाव कम करें और दिनचर्या स्थिर रखें
  • अचानक ठंडा पानी न पिलाएं (विशेषकर गर्मी में)

याद रखें: कॉलिक के लक्षण दिखते ही तुरंत पशु चिकित्सक को बुलाएं। हर मिनट महत्वपूर्ण है। देरी से घोड़े की जान जा सकती है।

स्ट्रैंगल्स / गलघोंटू - घोड़ा

बीमारी के बारे में:

स्ट्रैंगल्स घोड़ों की एक अत्यधिक संक्रामक बैक्टीरियल बीमारी है जो स्ट्रेप्टोकोकस इक्वाई नामक बैक्टीरिया से होती है। यह ऊपरी श्वसन तंत्र को प्रभावित करती है और गले की लिम्फ नोड्स में गंभीर सूजन और फोड़े बनाती है। इसे "गलघोंटू" भी कहते हैं क्योंकि सूजी हुई ग्रंथियां सांस लेने में रुकावट पैदा कर सकती हैं।

लक्षण:

  • तेज बुखार (103-106°F / 39.5-41°C)
  • भूख न लगना और निगलने में कठिनाई
  • नाक से गाढ़ा पीला-हरा मवाद निकलना
  • गले के नीचे और जबड़े के पास लिम्फ नोड्स में गंभीर सूजन
  • सूजी हुई ग्रंथियों में दर्द और गर्मी
  • सिर और गर्दन को फैलाकर रखना (सांस लेने के लिए)
  • खांसी और घरघराहट
  • सुस्ती और कमजोरी
  • फोड़े फूटने पर मवाद का बहाव
  • सांस लेने में कठिनाई (गंभीर मामलों में)

कारण:

  • स्ट्रेप्टोकोकस इक्वाई बैक्टीरिया का संक्रमण
  • संक्रमित घोड़े के नाक/मुंह के स्राव से सीधा संपर्क
  • संक्रमित बाल्टी, चारा, पानी के बर्तन से
  • संक्रमित उपकरण, कपड़े, या हाथों से
  • हवा के माध्यम से (छींक, खांसी से)
  • कैरियर घोड़े जो बीमार नहीं दिखते लेकिन बैक्टीरिया फैलाते हैं
  • युवा घोड़े (1-5 वर्ष) अधिक संवेदनशील
  • भीड़भाड़, तनाव, खराब स्वच्छता

निदान:

  • लक्षणों की पहचान (बुखार, गले की सूजन, नाक से मवाद)
  • नाक/गले के स्वैब से बैक्टीरिया कल्चर
  • PCR टेस्ट (बैक्टीरिया की पहचान)
  • रक्त परीक्षण (एंटीबॉडी टेस्ट)
  • फोड़े से मवाद का सैंपल लेकर जांच
  • एंडोस्कोपी (गले की जांच)

उपचार और बचाव

⚠️ महत्वपूर्ण: यह बीमारी अत्यधिक संक्रामक है। संक्रमित घोड़े को तुरंत अलग करें और सख्त क्वारंटाइन लागू करें। सभी उपकरण अलग रखें।

दवाइयाँ और इलाज:

१. एंटीबायोटिक्स (विवादास्पद - सावधानी से उपयोग):

  • पेनिसिलिन - 22,000-44,000 IU/kg, IM, हर 12 घंटे
  • सेफ्टियोफर - 2.2-4.4 mg/kg, IM, हर 24 घंटे
  • ट्राइमेथोप्रिम-सल्फा - 30 mg/kg, मुंह से, हर 12 घंटे
  • नोट: शुरुआती चरण में एंटीबायोटिक्स फोड़े बनने में रुकावट डाल सकते हैं
  • फोड़े फूटने के बाद या गंभीर जटिलताओं में ही दें

२. दर्द और बुखार कम करने वाली दवाएं:

  • फेनिलब्यूटाजोन - 2.2-4.4 mg/kg, मुंह से, हर 12 घंटे
  • फ्लूनिक्सिन मेग्लूमीन - 1.1 mg/kg, IV, हर 12-24 घंटे
  • मेलोक्सिकैम - 0.6 mg/kg, मुंह से, हर 24 घंटे
  • दर्द और सूजन कम करने में मदद

३. फोड़े का उपचार (सबसे महत्वपूर्ण):

  • गर्म सेंक (हॉट फोमेंटेशन) - दिन में 3-4 बार, 15-20 मिनट
  • फोड़े को पकने दें - जल्दबाजी न करें
  • पक जाने पर पशु चिकित्सक से लांस (चीरा) लगवाएं
  • मवाद पूरी तरह निकलने दें
  • घाव को रोज साफ करें - बीटाडीन या हाइड्रोजन पेरोक्साइड से
  • घाव खुला रखें ताकि मवाद बाहर निकलता रहे

४. श्वसन सहायता:

  • गर्म पानी की भाप - दिन में 2-3 बार (यूकेलिप्टस ऑयल मिलाएं)
  • ब्रोंकोडायलेटर - क्लेनब्यूटेरोल 0.8 mcg/kg (सांस की तकलीफ में)
  • नेब्युलाइजेशन - सेलाइन या दवा के साथ
  • गंभीर मामलों में ट्रेकियोस्टोमी (सर्जिकल एयरवे)

५. पोषण और द्रव चिकित्सा:

  • नरम, गीला चारा - निगलने में आसानी के लिए
  • उच्च गुणवत्ता का दाना (अगर खा सके)
  • ताजा, साफ पानी हमेशा उपलब्ध
  • IV फ्लूइड - अगर नहीं खा-पी रहा हो
  • नासोगैस्ट्रिक ट्यूब से तरल आहार (गंभीर मामलों में)
  • इलेक्ट्रोलाइट सप्लीमेंट

६. इम्यून सपोर्ट:

  • विटामिन C - 10-20 ग्राम प्रतिदिन
  • विटामिन E - रोग प्रतिरोधक क्षमता के लिए
  • प्रोबायोटिक्स - आंत के स्वास्थ्य के लिए
  • अच्छा पोषण और आराम

७. जटिलताओं का उपचार:

  • गट्टुरल पाउच एम्पाइमा: एंडोस्कोपिक लैवेज, लंबे समय तक एंटीबायोटिक्स
  • बैस्टर्ड स्ट्रैंगल्स: आक्रामक एंटीबायोटिक थेरेपी, सर्जिकल ड्रेनेज
  • पर्पुरा हेमोरेजिका: कॉर्टिकोस्टेरॉयड, प्लाज्मा थेरेपी

घर पर देखभाल:

  • पूर्ण अलगाव - कम से कम 4 सप्ताह या जब तक मवाद आना बंद न हो
  • नाक और फोड़े से निकलने वाले मवाद को रोज साफ करें
  • तापमान दिन में दो बार मापें
  • गर्म, सूखी, हवादार जगह में रखें
  • तनाव कम करें, पूरा आराम दें

बचाव के उपाय:

  • टीकाकरण:
  • स्ट्रैंगल्स वैक्सीन उपलब्ध है (इंट्रानेजल या इंजेक्शन)
  • उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में टीकाकरण करें
  • टीका 100% सुरक्षा नहीं देता लेकिन गंभीरता कम करता है
  • क्वारंटाइन प्रोटोकॉल:
  • सभी नए घोड़ों को 3-4 सप्ताह अलग रखें
  • रोज तापमान जांचें
  • किसी भी लक्षण पर तुरंत जांच
  • स्वच्छता और बायोसिक्योरिटी:
  • उपकरण साझा न करें
  • संक्रमित क्षेत्र को डिसइन्फेक्ट करें (ब्लीच, वर्कॉन)
  • बीमार घोड़ों के संपर्क से बचें
  • हाथ धोना और कपड़े बदलना जरूरी
  • पानी और चारे के बर्तन अलग रखें

याद रखें: स्ट्रैंगल्स बहुत संक्रामक है। कड़ा क्वारंटाइन और स्वच्छता जरूरी है। फोड़े को पकने दें, जल्दी एंटीबायोटिक देने से समस्या बढ़ सकती है। ठीक होने के बाद भी 4-6 सप्ताह तक सावधानी रखें।

इक्वाइन इन्फ्लुएंजा (घोड़ों का फ्लू) - घोड़ा

बीमारी के बारे में:

इक्वाइन इन्फ्लुएंजा घोड़ों में होने वाला एक अत्यधिक संक्रामक वायरल रोग है जो श्वसन तंत्र को प्रभावित करता है। यह इन्फ्लुएंजा A वायरस (H3N8 और H7N7) के कारण होता है। यह बहुत तेजी से फैलता है और घोड़ों के बड़े समूहों को प्रभावित कर सकता है।

लक्षण:

  • अचानक तेज बुखार (102-106°F / 39-41°C)
  • सूखी, कठोर खांसी जो 2-3 सप्ताह तक रह सकती है
  • नाक से पानी जैसा स्राव, बाद में गाढ़ा पीला-हरा
  • आंखों से पानी आना
  • भूख में कमी और सुस्ती
  • सांस लेने में कठिनाई या तेज सांस
  • गले की लिम्फ नोड्स में सूजन
  • मांसपेशियों में दर्द और अकड़न
  • काम करने की क्षमता में कमी
  • सिर नीचे झुकाए रखना

कारण:

  • इन्फ्लुएंजा A वायरस (H3N8 और H7N7 स्ट्रेन)
  • संक्रमित घोड़े की खांसी या छींक से हवा में फैलाव
  • संक्रमित उपकरण, कपड़े या हाथों से फैलाव
  • भीड़भाड़ वाली जगहों पर तेजी से फैलता है
  • कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता
  • टीकाकरण न होना
  • तनाव, यात्रा या प्रतियोगिताओं के दौरान
  • ठंडा और नम मौसम

निदान:

  • लक्षणों की पहचान और इतिहास
  • शरीर का तापमान मापना
  • नाक और गले से स्वैब लेकर वायरस की जांच
  • PCR टेस्ट (वायरल जीन की पहचान)
  • रक्त परीक्षण (एंटीबॉडी टेस्ट)
  • फेफड़ों की जांच (स्टेथोस्कोप या अल्ट्रासाउंड)
  • छाती का एक्स-रे (गंभीर मामलों में)

उपचार और बचाव

⚠️ महत्वपूर्ण: यह बीमारी बहुत तेजी से फैलती है। संक्रमित घोड़े को तुरंत अलग करें। पशु चिकित्सक को बुलाएं।

दवाइयाँ और इलाज:

१. सहायक उपचार (कोई विशिष्ट एंटीवायरल नहीं):

  • पूर्ण आराम - कम से कम 3-4 सप्ताह (खांसी के हर हफ्ते के लिए 1 सप्ताह आराम)
  • अलगाव - संक्रमित घोड़े को दूसरों से अलग रखें
  • ताजी हवा और अच्छी हवादार जगह
  • धूल-मुक्त, साफ वातावरण

२. बुखार और दर्द कम करने वाली दवाएं:

  • फेनिलब्यूटाजोन - 2.2-4.4 mg/kg, मुंह से या IV, हर 12 घंटे
  • फ्लूनिक्सिन मेग्लूमीन - 1.1 mg/kg, IV, हर 12-24 घंटे
  • केटोप्रोफेन - 2.2 mg/kg, IV, दिन में एक बार
  • बुखार 102°F से ऊपर होने पर ही दें

३. द्वितीयक बैक्टीरियल संक्रमण के लिए एंटीबायोटिक्स:

  • पेनिसिलिन - 22,000 IU/kg, IM, हर 12 घंटे (7-10 दिन)
  • ट्राइमेथोप्रिम-सल्फा - 30 mg/kg, मुंह से, हर 12 घंटे
  • सेफ्टियोफर - 2.2 mg/kg, IM, दिन में एक बार
  • जेंटामाइसिन - 6.6 mg/kg, IV (गंभीर निमोनिया में)
  • केवल पीले-हरे नाक के स्राव या बिगड़ते लक्षणों में दें

४. खांसी और श्वसन सहायता:

  • ब्रोंकोडायलेटर - क्लेनब्यूटेरोल 0.8 mcg/kg, मुंह से, हर 12 घंटे
  • एक्सपेक्टोरेंट - डेम्ब्रेक्सीन या अमोनियम क्लोराइड
  • म्यूकोलाइटिक - एसिटाइलसिस्टीन (नेब्युलाइजेशन)
  • गर्म पानी की भाप देना (स्टीम इनहेलेशन)

५. पोषण और हाइड्रेशन:

  • ताजा, साफ पानी हमेशा उपलब्ध रखें
  • नरम, धूल-मुक्त चारा (पानी में भिगोकर)
  • पौष्टिक दाना (अगर घोड़ा खाए)
  • इलेक्ट्रोलाइट सप्लीमेंट (बुखार में)
  • विटामिन C और E सप्लीमेंट - रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए

६. इम्युनोमॉड्यूलेटर:

  • इंटरफेरॉन अल्फा - रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए
  • प्रोबायोटिक्स - पाचन और इम्युनिटी के लिए
  • एंटीऑक्सीडेंट सप्लीमेंट

७. गंभीर मामलों में:

  • IV फ्लूइड थेरेपी (डिहाइड्रेशन में)
  • ऑक्सीजन थेरेपी (सांस की गंभीर समस्या में)
  • नेब्युलाइजेशन थेरेपी
  • अस्पताल में भर्ती

घर पर देखभाल:

  • पूर्ण आराम - कम से कम 3-4 सप्ताह या जब तक खांसी पूरी तरह ठीक न हो
  • नाक और आंखों को नियमित रूप से साफ करें
  • गर्म पानी की भाप दिन में 2-3 बार (15-20 मिनट)
  • तापमान रोज मापें और रिकॉर्ड करें
  • धूल-मुक्त वातावरण बनाए रखें

बचाव के उपाय:

  • नियमित टीकाकरण सबसे महत्वपूर्ण:
  • शुरुआती टीका - 3 महीने की उम्र में
  • बूस्टर डोज - पहले टीके के 4-6 सप्ताह बाद
  • तीसरा बूस्टर - 6 महीने बाद
  • वार्षिक बूस्टर - हर साल (उच्च जोखिम वाले घोड़ों में हर 6 महीने)
  • सामान्य बचाव:
  • नए घोड़ों को 2-3 सप्ताह अलग रखें (क्वारंटाइन)
  • बीमार घोड़ों से दूर रखें
  • साफ-सफाई और स्वच्छता बनाए रखें
  • उपकरण और कपड़े साझा न करें
  • भीड़भाड़ वाली जगहों पर सावधानी
  • अच्छा पोषण और स्वस्थ जीवनशैली
  • तनाव कम करें

याद रखें: इन्फ्लुएंजा बहुत तेजी से फैलता है। टीकाकरण ही सबसे अच्छा बचाव है। बीमार घोड़े को तुरंत अलग करें और पूरा आराम दें। जल्दबाजी में काम पर लगाने से निमोनिया हो सकता है।

लैमिनाइटिस (खुर की सूजन) - घोड़ा

बीमारी के बारे में:

लैमिनाइटिस घोड़ों में खुर की एक गंभीर और दर्दनाक बीमारी है जिसमें खुर के अंदर की संवेदनशील परतें (लैमिनी) सूज जाती हैं। यह घोड़े को स्थायी रूप से लंगड़ा बना सकती है। खुर की हड्डी (कॉफिन बोन) घूम सकती है या नीचे धंस सकती है।

लक्षण:

  • गंभीर लंगड़ापन, विशेषकर अगले पैरों में
  • चलने से इनकार या अनिच्छा
  • खुरों में तेज गर्मी और तेज नाड़ी महसूस होना
  • खड़े होते समय पिछले पैरों पर अधिक वजन डालना
  • लेटे रहना और उठने में कठिनाई
  • कठोर, लकड़ी जैसी चाल
  • पैरों को आगे खींचकर खड़ा होना (फाउंडर स्टांस)
  • बार-बार वजन बदलना, एक पैर से दूसरे पर
  • तेज सांस लेना और पसीना आना (दर्द के कारण)
  • बढ़ी हुई हृदय गति

कारण:

  • अधिक मात्रा में दाना या हरा चारा खाना (विशेषकर वसंत में)
  • मोटापा और मेटाबोलिक सिंड्रोम
  • कुशिंग रोग (PPID - हार्मोन की समस्या)
  • कठोर जमीन पर अधिक दौड़ना
  • एक पैर पर अधिक वजन (दूसरे पैर की चोट के कारण)
  • प्रसव के बाद (रिटेंड प्लेसेंटा)
  • गंभीर बीमारी या संक्रमण के बाद
  • ठंडे पानी से अधिक मात्रा में पानी पीना (गर्म होने पर)
  • स्टेरॉयड दवाओं का अधिक उपयोग

निदान:

  • लक्षणों और चाल की जांच
  • खुर की गर्मी और धड़कन की जांच
  • हूफ टेस्टर से दबाव देकर दर्द की जांच
  • एक्स-रे से खुर की हड्डी की स्थिति देखना
  • वेंग्राम टेस्ट (खुर में सूजन की जांच)
  • रक्त परीक्षण (ACTH, इंसुलिन लेवल)

उपचार और बचाव

⚠️ महत्वपूर्ण: लैमिनाइटिस एक आपातकालीन स्थिति है। तुरंत पशु चिकित्सक और फैरियर को बुलाएं। जल्दी इलाज न करने पर स्थायी विकलांगता हो सकती है।

दवाइयाँ और इलाज:

१. दर्द निवारक और सूजन कम करने वाली दवाएं:

  • फेनिलब्यूटाजोन (ब्यूट) - 2.2-4.4 mg/kg, मुंह से या IV, हर 12 घंटे में
  • फ्लूनिक्सिन मेग्लूमीन - 1.1 mg/kg, IV, हर 12-24 घंटे
  • केटोप्रोफेन - 2.2 mg/kg, IV, दिन में एक बार
  • फिरोकॉक्सिब - 0.1 mg/kg, मुंह से, दिन में एक बार
  • ब्रांड: Equipalazone, Phenylzone, Finadyne

२. रक्त प्रवाह बढ़ाने वाली दवाएं:

  • पेंटोक्सिफाइलाइन - 8.5 mg/kg, मुंह से, हर 12 घंटे
  • एस्पिरिन - 10-20 mg/kg, मुंह से, दिन में एक बार
  • आइसॉक्सुप्रिन - 0.6 mg/kg, मुंह से, हर 12 घंटे
  • ये दवाएं खुर में रक्त संचार सुधारती हैं

३. आइस थेरेपी (क्रायोथेरेपी):

  • शुरुआती 48-72 घंटों में बर्फ से खुर को ठंडा करें
  • बर्फ के पानी में खुर को 20-30 मिनट तक डुबोएं
  • हर 2-3 घंटे में दोहराएं
  • यह सूजन और दर्द कम करता है

४. खुर की देखभाल (फैरियर केयर):

  • तुरंत घोड़े के जूते (शूज) हटा दें
  • विशेष थेरेप्यूटिक शूइंग या पैड लगाएं
  • हार्ट बार शूज़ या फ्रॉग सपोर्ट पैड्स का उपयोग
  • नरम बेडिंग पर रखें (रेत या रबर मैट)

५. आहार प्रबंधन:

  • तुरंत दाना और हरा चारा बंद करें
  • केवल घास का सूखा चारा दें (कम शुगर वाला)
  • चारे को पानी में भिगोकर दें
  • वजन नियंत्रण बहुत जरूरी है
  • कम कार्बोहाइड्रेट, उच्च फाइबर आहार

६. सहायक दवाएं:

  • एसेप्रोमैज़ीन - 0.02-0.04 mg/kg, IV (रक्त प्रवाह के लिए)
  • DMSO - सूजन कम करने के लिए
  • गैबापेंटिन - गंभीर दर्द में, 5-20 mg/kg मुंह से
  • ओमेप्राज़ोल - पेट की सुरक्षा के लिए

७. क्रोनिक लैमिनाइटिस के लिए:

  • लेवोथायरोक्सिन - मेटाबोलिज्म सुधारने के लिए
  • मेटफॉर्मिन - इंसुलिन प्रतिरोध में (पोनी/मिनिएचर में)
  • कुशिंग रोग हो तो पर्गोलाइड - 0.002 mg/kg, मुंह से
  • नियमित फैरियर विज़िट हर 4-6 सप्ताह में

तत्काल प्राथमिक उपचार:

  • घोड़े को तुरंत स्टैंडिंग बंद करें, बैठने दें
  • नरम जमीन या रेत पर रखें
  • खुरों को बर्फ के पानी में डुबोएं
  • खाना-पानी नियंत्रित करें
  • घोड़े को चलने के लिए मजबूर न करें

बचाव के उपाय:

  • संतुलित आहार दें, अधिक दाना या हरा चारा न दें
  • वजन नियंत्रण बहुत महत्वपूर्ण है
  • वसंत ऋतु में चारागाह का समय सीमित करें
  • नियमित व्यायाम करवाएं
  • खुरों की नियमित सफाई और ट्रिमिंग
  • कठोर जमीन पर तेज दौड़ से बचें
  • ठंडे पानी से अधिक पानी न पिलाएं (गर्म होने पर)
  • मोटे घोड़ों को डाइट पर रखें
  • कुशिंग रोग की नियमित जांच करवाएं (बुजुर्ग घोड़ों में)

याद रखें: लैमिनाइटिस गंभीर और स्थायी नुकसान कर सकती है। शुरुआती लक्षणों पर तुरंत ध्यान दें। रोकथाम सबसे अच्छा इलाज है। मोटापे से बचाव और आहार नियंत्रण सबसे जरूरी है।

टिटनस (धनुर्वात/लॉकजॉ) - घोड़ा

बीमारी के बारे में:

टिटनस एक गंभीर और अक्सर जानलेवा बैक्टीरियल रोग है जो क्लोस्ट्रिडियम टिटैनी बैक्टीरिया द्वारा उत्पन्न विष (टॉक्सिन) के कारण होता है। घोड़े इस बीमारी के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। यह तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है और मांसपेशियों में गंभीर अकड़न और ऐंठन पैदा करता है। इसे "लॉकजॉ" भी कहते हैं क्योंकि जबड़े की मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं।

लक्षण:

  • जबड़े की मांसपेशियों में अकड़न (लॉकजॉ) - खाना-पीना मुश्किल
  • तीसरी पलक (निक्टिटेटिंग मेम्ब्रेन) का बाहर निकलना
  • कान सीधे और पीछे की ओर खड़े रहना
  • नथुने फैले रहना और सांस लेने में कठिनाई
  • पूरे शरीर की मांसपेशियों में अकड़न
  • पैर सीधे और कड़े होना (सॉहॉर्स स्टांस)
  • पूंछ सख्त और ऊपर उठी रहना
  • चलने में कठिनाई, लकड़ी जैसी चाल
  • आवाज या छूने पर ऐंठन और तेज प्रतिक्रिया
  • खड़े होने में कठिनाई, गिरने का खतरा
  • निगलने में समस्या, लार टपकना
  • पसीना आना और बेचैनी
  • बाद में लेटना और उठ न पाना

कारण:

  • क्लोस्ट्रिडियम टिटैनी बैक्टीरिया के बीजाणु (स्पोर्स)
  • मिट्टी, धूल, और खाद में बीजाणु मौजूद रहते हैं
  • घावों के माध्यम से शरीर में प्रवेश (खासकर गहरे घाव)
  • तार की बाड़ से चोट, काँटे चुभना
  • सर्जरी या कैस्ट्रेशन के बाद
  • नाल ठोकने के दौरान घाव
  • प्रसव के बाद संक्रमण (नाभि या गर्भाशय)
  • कोई भी पंचर घाव जिसमें ऑक्सीजन न पहुंचे
  • टीकाकरण न होना

निदान:

  • लक्षणों की पहचान (लॉकजॉ, तीसरी पलक, अकड़न)
  • घाव का इतिहास (हाल में कोई चोट या सर्जरी)
  • टीकाकरण का इतिहास जांचना
  • शरीर और पैरों की अकड़न की जांच
  • आवाज या छूने पर प्रतिक्रिया देखना
  • कोई विशेष लैब टेस्ट नहीं - नैदानिक लक्षण ही पुष्टि करते हैं

उपचार और बचाव

⚠️ महत्वपूर्ण: टिटनस एक जानलेवा आपातकालीन स्थिति है। तुरंत पशु चिकित्सक को बुलाएं। बिना इलाज मृत्यु दर 80% से अधिक है। जल्दी इलाज से बचने की संभावना बढ़ती है।

दवाइयाँ और इलाज:

१. टिटनस एंटीटॉक्सिन (सबसे महत्वपूर्ण):

  • टिटनस एंटीटॉक्सिन (TAT) - 10,000-100,000 IU, IV या IM
  • जितनी जल्दी दिया जाए उतना बेहतर
  • यह पहले से बने विष को बेअसर करता है
  • हर 1-2 दिन में दोहरा सकते हैं
  • कुछ हिस्सा स्पाइनल (रीढ़ में) भी दिया जा सकता है

२. एंटीबायोटिक्स (बैक्टीरिया को मारने के लिए):

  • पेनिसिलिन जी - 44,000-88,000 IU/kg, IV, हर 6 घंटे
  • मेट्रोनिडाजोल - 15-25 mg/kg, IV या मुंह से, हर 8-12 घंटे
  • कम से कम 7-10 दिन तक देना जरूरी
  • बैक्टीरिया को बढ़ने से रोकता है

३. मांसपेशियों को आराम देने वाली दवाएं:

  • डायजेपाम (वैलियम) - 0.05-0.4 mg/kg, IV, हर 4-6 घंटे
  • मिडाजोलम - 0.02-0.1 mg/kg, IV
  • मेथोकार्बामोल - 15-25 mg/kg, IV, धीरे-धीरे
  • गुएफेनेसिन - 50-100 mg/kg, IV (निरंतर ड्रिप)
  • ऐंठन और अकड़न कम करने के लिए

४. शांत करने वाली दवाएं:

  • एसेप्रोमैज़ीन - 0.02-0.05 mg/kg, IM, हर 6-8 घंटे
  • डेटोमिडीन - 0.005-0.02 mg/kg, IV
  • ज़ाइलाज़ीन - 0.5-1.0 mg/kg, IV
  • घोड़े को शांत रखने और तनाव कम करने के लिए

५. घाव की देखभाल:

  • घाव को खोलें और साफ करें (डेब्राइडमेंट)
  • हाइड्रोजन पेरोक्साइड से धोएं (ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए)
  • बीटाडीन या क्लोरहेक्सिडिन से सफाई
  • घाव को खुला रखें ताकि हवा पहुंचे
  • रोज ड्रेसिंग करें

६. सहायक चिकित्सा:

  • IV फ्लूइड थेरेपी - हाइड्रेशन बनाए रखने के लिए
  • पोषण समर्थन - नासोगैस्ट्रिक ट्यूब से तरल आहार
  • मूत्राशय की देखभाल - कैथेटर से मूत्र निकालना
  • एनीमा - मल निकालने के लिए
  • इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बनाए रखना

७. पर्यावरणीय प्रबंधन:

  • अंधेरा, शांत, और ध्वनि-रहित वातावरण
  • नरम, गहरी बेडिंग (रेत या रबर मैट)
  • न्यूनतम हैंडलिंग और उत्तेजना
  • गद्देदार दीवारें (चोट से बचाव के लिए)
  • स्लिंग या हार्नेस (अगर खड़ा नहीं हो पा रहा)

८. टीकाकरण (बीमारी के दौरान भी):

  • टिटनस टॉक्सॉयड - सक्रिय प्रतिरक्षा के लिए
  • उपचार के दौरान अलग जगह पर लगाएं
  • भविष्य में सुरक्षा के लिए

नर्सिंग केयर (अत्यंत महत्वपूर्ण):

  • 24/7 निगरानी और देखभाल जरूरी
  • हर 2-3 घंटे में करवट बदलवाएं (लेटा हुआ हो तो)
  • त्वचा को साफ और सूखा रखें (बेडसोर से बचाव)
  • आंखों में ल्यूब्रिकेंट लगाएं (सूखने से बचाव)
  • शांत वातावरण बनाए रखें - कम रोशनी, कम शोर
  • तनाव कम करें - कम हैंडलिंग
  • धैर्य रखें - ठीक होने में 3-6 सप्ताह या अधिक लग सकते हैं

बचाव के उपाय:

  • नियमित टीकाकरण (सबसे महत्वपूर्ण):
  • प्रथम टीका - 4-6 महीने की उम्र में
  • दूसरा टीका - 4-6 सप्ताह बाद
  • तीसरा टीका - 6-12 महीने बाद
  • बूस्टर डोज - हर साल या हर 2 साल में
  • गर्भवती घोड़ी - प्रसव से 4-6 सप्ताह पहले बूस्टर
  • घाव की देखभाल:
  • किसी भी घाव को तुरंत साफ करें
  • गहरे या गंदे घाव पर टिटनस एंटीटॉक्सिन दें (अगर टीका नहीं)
  • सर्जरी से पहले टीकाकरण की स्थिति जांचें
  • सामान्य सावधानियां:
  • तार की बाड़ और नुकीली चीजों से बचाएं
  • नाल ठोकते समय सावधानी
  • बच्चों की नाभि की उचित देखभाल

याद रखें: टिटनस 100% रोकथाम योग्य बीमारी है - नियमित टीकाकरण से। लेकिन एक बार हो जाए तो बहुत गंभीर है। मृत्यु दर 50-80% है। जल्दी पहचान और आक्रामक उपचार से बचने की संभावना बढ़ती है। पूरी तरह ठीक होने में महीनों लग सकते हैं।

चेचक - ऊँट

बीमारी के बारे में:

चेचक ऊँटों की एक गंभीर वायरल बीमारी है जो पॉक्स वायरस के कारण होती है। यह त्वचा पर दाने, फफोले और घाव पैदा करती है। संक्रमित ऊँट से सीधे संपर्क, हवा या संक्रमित उपकरणों से फैलता है। युवा ऊँटों में अधिक खतरनाक और मृत्यु दर 25-30% तक हो सकती है।

लक्षण:

  • तेज बुखार (104-106°F) जो 5-7 दिन रहता है
  • त्वचा पर लाल दाने जो फफोलों में बदल जाते हैं
  • मुंह, नाक, होंठ और थन पर घाव
  • सूजी हुई लसिका ग्रंथियां (गर्दन और जबड़े के नीचे)
  • आंखों से पानी और स्राव
  • नाक से म्यूकस निकलना
  • भूख न लगना और कमजोरी
  • दूध उत्पादन में भारी गिरावट (60-80%)
  • वजन कम होना
  • सांस लेने में तकलीफ (गंभीर मामलों में)

कारण:

  • कैमेलपॉक्स वायरस (Orthopoxvirus परिवार)
  • संक्रमित ऊँट से सीधा संपर्क
  • संक्रमित ऊँट की लार, नाक या फफोले का स्राव
  • संक्रमित चारागाह या पानी
  • मच्छर, मक्खी और अन्य कीड़ों द्वारा
  • संक्रमित उपकरण और बर्तन
  • कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता
  • भीड़भाड़ और खराब स्वच्छता

निदान:

  • त्वचा के घावों और लक्षणों की जांच
  • बुखार और सूजी लसिका ग्रंथियों की पहचान
  • फफोले के तरल पदार्थ की प्रयोगशाला जांच
  • पीसीआर टेस्ट (वायरस की पुष्टि के लिए)
  • इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (विशेष मामलों में)
  • रक्त परीक्षण (एंटीबॉडी डिटेक्शन)

उपचार और बचाव

⚠️ महत्वपूर्ण: चेचक का कोई विशिष्ट एंटीवायरल इलाज नहीं है। उपचार मुख्य रूप से सहायक और लक्षण आधारित होता है। संक्रमित ऊँट को तुरंत अलग करें।

दवाइयाँ और इलाज:

१. एंटीबायोटिक्स (द्वितीयक संक्रमण रोकने के लिए):

  • ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन (टेरामाइसिन) - 10-20 mg/kg शरीर भार, IM, दिन में एक बार, 5-7 दिन
  • पेनिसिलिन-स्ट्रेप्टोमाइसिन कॉम्बो - 20,000 IU/kg पेनिसिलिन + 10 mg/kg स्ट्रेप्टोमाइसिन, IM, दिन में दो बार
  • एनरोफ्लोक्सासिन - 5 mg/kg, IM या SC, दिन में एक बार, 5 दिन
  • सेफ्ट्रियाक्सोन - 25 mg/kg, IM, दिन में एक बार
  • ब्रांड: Terramycin, Penstrep, Baytril, Ceftaxim

२. बुखार और दर्द निवारक:

  • पैरासिटामोल (एसिटामिनोफेन) - 10-15 mg/kg, मुंह से, हर 12 घंटे
  • फ्लूनिक्सिन मेग्लूमीन - 1.1 mg/kg, IV या IM, दिन में एक बार
  • मेलोक्सिकैम - 0.5 mg/kg, मुंह से या IM, दिन में एक बार
  • फिनाइलब्यूटाजोन (ब्यूट) - 4.4 mg/kg, मुंह से, हर 12 घंटे
  • ब्रांड: Calpol, Finadyne, Melonex, Butazolidin

३. घाव और त्वचा के लिए स्थानीय उपचार:

  • बीटाडीन सॉल्यूशन (10% पोविडोन आयोडीन) - घावों को दिन में 2-3 बार साफ करें
  • पोटैशियम परमैंगनेट (1:1000) - घावों को धोने के लिए
  • जेंशियन वायलेट (1-2%) - घावों पर लगाएं, सूखने में मदद करता है
  • सिल्वर सल्फाडियाजीन क्रीम - जले हुए जैसे घावों पर
  • नीम तेल या नारियल तेल - प्राकृतिक एंटीसेप्टिक, दिन में 2 बार
  • बोरिक एसिड पाउडर - घावों को सूखा रखने के लिए
  • ब्रांड: Betadine, Dermicool, Silverex, Himax

४. इम्यूनिटी बढ़ाने वाली दवाएं:

  • विटामिन A, D, E कॉम्बो इंजेक्शन - 10-15 ml, IM, साप्ताहिक 2-3 बार
  • विटामिन C (एस्कॉर्बिक एसिड) - 2-3 ग्राम, IV, दिन में एक बार
  • विटामिन B-कॉम्प्लेक्स - 15-20 ml, IM, हर दूसरे दिन
  • मिनरल मिक्सचर - मुंह से, दैनिक
  • इम्यूनोमॉड्यूलेटर (जैसे लिवामिसोल) - 2.5 mg/kg, SC, साप्ताहिक
  • ब्रांड: Tribivet, Intavita, Polybion, Livamec

५. सहायक देखभाल:

  • इलेक्ट्रोलाइट सॉल्यूशन - 5-10 लीटर, IV या मुंह से (निर्जलीकरण में)
  • ग्लूकोज (5-10%) - 2-4 लीटर IV (कमजोरी में)
  • एंटीहिस्टामिन (क्लोरफेनिरामाइन) - 0.5 mg/kg, IM, खुजली कम करने के लिए
  • आई ड्रॉप्स (सिप्रोफ्लोक्सासिन) - आंखों के संक्रमण के लिए, दिन में 3-4 बार
  • पौष्टिक और सुपाच्य आहार - हरा चारा, दलिया, गुड़
  • ताजा और साफ पानी भरपूर मात्रा में

६. थन में संक्रमण का इलाज (दुधारू ऊँटों में):

  • इंट्रामेमेरी एंटीबायोटिक ट्यूब - थन में सीधे डालें, दिन में दो बार
  • एंटी-इन्फ्लेमेटरी क्रीम - थन पर बाहर से मालिश करें
  • दूध निकालना बंद करें जब तक संक्रमण ठीक न हो
  • ब्रांड: Mastilac, Cloxamast

तत्काल प्राथमिक देखभाल:

  • संक्रमित ऊँट को तुरंत अलग साफ बाड़े में रखें
  • घावों को रोज धोएं और साफ रखें
  • छाया में ठंडी जगह पर रखें
  • मक्खियों से बचाव के लिए मच्छरदानी या जाली लगाएं
  • नरम और पौष्टिक भोजन दें
  • अन्य ऊँटों से कम से कम 50 मीटर दूर रखें

बचाव के उपाय:

  • टीकाकरण: कैमेलपॉक्स वैक्सीन साल में एक बार, सभी ऊँटों को
  • नए ऊँट लाने पर 21 दिन की क्वारंटाइन अवधि जरूरी
  • बाड़े की नियमित सफाई और कीटाणुशोधन (फिनाइल या ब्लीचिंग पाउडर)
  • मच्छर और मक्खी नियंत्रण - कीटनाशक स्प्रे
  • भीड़भाड़ से बचें, प्रति ऊँट कम से कम 20 वर्ग मीटर जगह
  • साझा उपकरण, बर्तन, पानी के गर्त का इस्तेमाल न करें
  • पौष्टिक आहार दें, रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखें
  • संक्रमित ऊँट के संपर्क में आने के बाद हाथ और कपड़े धोएं
  • बीमार ऊँट के बाद स्वस्थ ऊँट को न छुएं

याद रखें: चेचक के लक्षण दिखते ही तुरंत पशु चिकित्सक को बुलाएं। शीघ्र उपचार से ठीक होने की संभावना बढ़ जाती है और अन्य ऊँटों में फैलने से रोका जा सकता है। टीकाकरण सबसे बेहतर बचाव है।

खुजली (मैंज/स्कैबीज) - ऊँट

बीमारी के बारे में:

खुजली या मैंज ऊँटों की एक अत्यंत संक्रामक त्वचा रोग है जो सूक्ष्म परजीवी कीड़ों (माइट्स) के कारण होता है। यह त्वचा की सतह पर या भीतर रहकर तीव्र खुजली, पपड़ी और बालों का झड़ना पैदा करता है। सार्कोप्टिक मैंज सबसे गंभीर प्रकार है और तेजी से पूरे झुंड में फैल सकता है।

लक्षण:

  • तीव्र खुजली, खासकर रात में और गर्म मौसम में
  • त्वचा पर पपड़ी और मोटी परतें (क्रस्ट)
  • बालों का झड़ना, गंजे धब्बे बनना
  • त्वचा का मोटा होना और सिकुड़ना (हाथी की त्वचा जैसा)
  • त्वचा पर लालिमा और सूजन
  • खरोंचने से घाव और रक्तस्राव
  • बेचैनी और नींद में कमी
  • वजन घटना और कमजोरी
  • दूध उत्पादन में कमी (30-50%)
  • पहले सिर, गर्दन, पैर से शुरू होकर पूरे शरीर में फैलना
  • गंभीर मामलों में त्वचा से दुर्गंध

कारण:

  • सार्कोप्टिक मैंज: सार्कोप्टेस स्कैबी माइट (त्वचा के अंदर घुसकर रहता है)
  • सोरोप्टिक मैंज: सोरोप्टेस माइट (त्वचा की सतह पर)
  • कोरियोप्टिक मैंज: कोरियोप्टेस माइट (पैरों में)
  • संक्रमित ऊँट से सीधा संपर्क
  • संक्रमित बिस्तर, रस्सी, कंबल से
  • संक्रमित बाड़े और उपकरणों से
  • भीड़भाड़ और खराब स्वच्छता
  • कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता
  • कुपोषण और विटामिन की कमी

निदान:

  • त्वचा की नैदानिक जांच (खुजली, पपड़ी, गंजापन)
  • त्वचा स्क्रैपिंग टेस्ट (माइक्रोस्कोप से माइट्स देखना)
  • पपड़ी का पोटैशियम हाइड्रॉक्साइड (KOH) टेस्ट
  • त्वचा बायोप्सी (गंभीर मामलों में)
  • रक्त जांच (एलर्जी और संक्रमण की पुष्टि)

उपचार और बचाव

⚠️ महत्वपूर्ण: खुजली अत्यधिक संक्रामक है। संक्रमित ऊँट को तुरंत अलग करें और पूरे झुंड का इलाज एक साथ करें। अधूरा इलाज से दोबारा संक्रमण हो सकता है।

दवाइयाँ और इलाज:

१. एंटी-पैरासिटिक इंजेक्शन (मुख्य इलाज):

  • आइवरमेक्टिन - 200-300 mcg/kg शरीर भार, SC, 14 दिन बाद दोहराएं (कम से कम 2-3 खुराक)
  • डोरामेक्टिन - 300 mcg/kg, SC या IM, 14 दिन बाद दोहराएं
  • मोक्सीडेक्टिन - 200 mcg/kg, SC, 14 दिन बाद दोहराएं
  • एबामेक्टिन - 200 mcg/kg, SC, 14 दिन बाद दोहराएं
  • ब्रांड: Ivomec, Noromectin, Dectomax, Bimectin
  • नोट: एक ही खुराक काफी नहीं, कम से कम 2-3 बार जरूर दें

२. बाहरी स्प्रे और डिप (त्वचा पर लगाने के लिए):

  • साइपरमेथ्रिन स्प्रे (10%) - पूरे शरीर पर, सप्ताह में 2 बार, 4-6 सप्ताह
  • डेल्टामेथ्रिन स्प्रे - पूरे शरीर पर, सप्ताह में 2 बार
  • अमिट्राज (Amitraz) डिप/स्प्रे (12.5%) - 500 ppm घोल, पूरे शरीर पर नहलाएं, हर 7-10 दिन
  • सल्फर (गंधक) पाउडर (5-10%) - तेल में मिलाकर प्रभावित हिस्सों पर लगाएं
  • फिप्रोनिल स्प्रे - प्रभावित क्षेत्रों पर, साप्ताहिक
  • ब्रांड: Butox, Taktic, Ectomec Spray, Negasunt
  • नोट: स्प्रे करने से पहले पपड़ी हटाएं, दवा त्वचा तक पहुंचनी चाहिए

३. त्वचा की सफाई और उपचार:

  • बेंजोइल पेरोक्साइड शैम्पू (2.5-5%) - पपड़ी हटाने के लिए, हर 3-4 दिन
  • क्लोरहेक्सिडीन शैम्पू (4%) - त्वचा संक्रमण से बचाव, हर 5 दिन
  • सल्फर सोप/शैम्पू - प्रभावित हिस्सों पर, हर 3 दिन
  • नीम तेल या करंज तेल - प्राकृतिक एंटी-पैरासिटिक, रोज लगाएं
  • सल्फर + लाइम सल्फर डिप - पारंपरिक उपचार, प्रभावी
  • ब्रांड: Sebazole, Chlorxy, Neem Gold

४. द्वितीयक संक्रमण के लिए एंटीबायोटिक्स:

  • ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन (LA) - 20 mg/kg, IM, हर 3 दिन, 3-4 खुराक
  • एनरोफ्लोक्सासिन - 5 mg/kg, IM, दैनिक, 5-7 दिन
  • सेफ्टियोफर - 2 mg/kg, IM, दैनिक, 3-5 दिन
  • ब्रांड: Terramycin LA, Baytril, Excenel

५. खुजली और सूजन कम करने के लिए:

  • एंटीहिस्टामिन (क्लोरफेनिरामाइन) - 0.5 mg/kg, IM, दिन में 2 बार
  • डेक्सामेथासोन - 5-10 mg, IM, पहले 3 दिन (गंभीर खुजली में)
  • फिनाइलब्यूटाजोन - 4 mg/kg, मुंह से, दैनिक
  • हाइड्रोकॉर्टिसोन क्रीम - स्थानीय रूप से प्रभावित हिस्सों पर

६. पोषण और इम्यूनिटी:

  • विटामिन A, D, E इंजेक्शन - 15-20 ml, IM, साप्ताहिक
  • जिंक सल्फेट - 500 mg, मुंह से, दैनिक (त्वचा स्वास्थ्य के लिए)
  • बायोटिन - 20 mg, मुंह से, दैनिक
  • ओमेगा-3 फैटी एसिड सप्लीमेंट - त्वचा की मरम्मत के लिए
  • मल्टीविटामिन-मिनरल पाउडर - 50 ग्राम, चारे में, दैनिक
  • ब्रांड: Tribivet, Zincomin, Megavit

७. पारंपरिक/घरेलू उपचार:

  • नीम की पत्तियों का काढ़ा - त्वचा धोने के लिए, दैनिक
  • हल्दी + सरसों का तेल पेस्ट - प्रभावित हिस्सों पर लगाएं
  • तंबाकू का पानी - 250 ग्राम तंबाकू + 5 लीटर पानी, उबालकर स्प्रे करें
  • गंधक + सरसों तेल - मिलाकर त्वचा पर लगाएं
  • करंज तेल + नींबू का रस - बराबर मात्रा में मिलाकर लगाएं

तत्काल प्राथमिक देखभाल:

  • संक्रमित ऊँट को तुरंत अलग करें
  • सभी पपड़ी और मोटी परत को ब्रश से हटाएं
  • गर्म पानी और शैम्पू से त्वचा धोएं
  • एंटी-पैरासिटिक स्प्रे पूरे शरीर पर करें
  • कान, पैर की उंगलियों के बीच भी दवा लगाएं
  • पुराने बिस्तर, रस्सी जला दें
  • पौष्टिक आहार दें

बचाव के उपाय:

  • नियमित निरीक्षण: सभी ऊँटों की त्वचा साप्ताहिक जांच करें
  • नए ऊँट की क्वारंटाइन: 21 दिन अलग रखें और जांच करें
  • प्रोफिलैक्टिक स्प्रे: साइपरमेथ्रिन, महीने में 1-2 बार
  • बाड़े की सफाई: हर 15 दिन में अच्छे से साफ करें और कीटाणुनाशक से धोएं
  • उपकरणों की सफाई: ब्रश, रस्सी, कंबल को फिनाइल या उबलते पानी से धोएं
  • भीड़भाड़ से बचें, हवादार बाड़ा रखें
  • पौष्टिक आहार दें, विटामिन-मिनरल की कमी न होने दें
  • बरसात के मौसम में विशेष सावधानी बरतें
  • झुंड का इलाज एक साथ करें, एक-दो ऊँट का नहीं
  • इलाज पूरा करें, बीच में न छोड़ें

याद रखें: खुजली का पूर्ण इलाज में 4-6 सप्ताह लग सकते हैं। धैर्य रखें और नियमित उपचार जारी रखें। एक ही इंजेक्शन या स्प्रे से माइट्स पूरी तरह नहीं मरते। कम से कम 2-3 बार इलाज दोहराना जरूरी है। पूरे झुंड का एक साथ इलाज करें, वर्ना दोबारा संक्रमण हो जाएगा।

सुर्रा - ऊँट

बीमारी के बारे में:

सुर्रा ऊँटों की एक घातक रक्त परजीवी बीमारी है जो ट्राइपैनोसोमा इवांसी नामक प्रोटोजोआ से होती है। यह चिचड़ी (हॉर्स फ्लाई) और अन्य खून चूसने वाली मक्खियों द्वारा फैलती है। यह रोग तेजी से फैलता है और इलाज न होने पर मृत्यु दर 60-80% तक हो सकती है।

लक्षण:

  • तेज बुखार जो आता-जाता रहता है (103-106°F)
  • गंभीर कमजोरी और सुस्ती
  • पलकों, आंखों के नीचे और जबड़े में सूजन
  • तेजी से वजन घटना
  • पीली श्लेष्मा झिल्लियां (एनीमिया)
  • कंपकंपी और लड़खड़ाकर चलना
  • त्वचा पर चकत्ते और बालों का झड़ना
  • दूध उत्पादन बंद हो जाना
  • पेशाब में खून (गंभीर मामलों में)
  • गर्भपात (गर्भवती ऊँटों में)
  • अंतिम चरण में लकवा और मृत्यु

कारण:

  • ट्राइपैनोसोमा इवांसी परजीवी (रक्त में रहता है)
  • चिचड़ी (टैबनस मक्खी) के काटने से
  • अन्य खून चूसने वाली मक्खियां (स्टोमोक्सिस)
  • संक्रमित सुई या उपकरणों से
  • संक्रमित ऊँट से यौन संपर्क
  • वर्षा ऋतु में अधिक फैलता है (मक्खियों की संख्या बढ़ने से)
  • जंगली जानवरों से पालतू ऊँटों में फैलना

निदान:

  • नैदानिक लक्षणों की पहचान (बुखार, सूजन, एनीमिया)
  • रक्त की माइक्रोस्कोपी जांच (परजीवी देखना)
  • गीम्सा स्टेन वाली ब्लड स्मीयर जांच
  • पीसीआर टेस्ट (सबसे सटीक)
  • कार्ड एग्लूटिनेशन टेस्ट (CATT)
  • हेमेटोक्रिट जांच (एनीमिया की पुष्टि)

उपचार और बचाव

⚠️ महत्वपूर्ण: सुर्रा का शीघ्र निदान और उपचार बेहद जरूरी है। देरी होने पर ऊँट की मृत्यु हो सकती है। तुरंत पशु चिकित्सक को बुलाएं।

दवाइयाँ और इलाज:

१. विशिष्ट एंटी-ट्राइपैनोसोमल दवाएं (मुख्य इलाज):

  • सुरामीन सोडियम (नागानोल) - 10 mg/kg शरीर भार, IV, धीरे-धीरे, एक बार
  • क्विनापाइरामीन सल्फेट/मिथाइलसल्फेट - 3-5 mg/kg, SC या IM, एकल खुराक
  • डिमिनाजीन एसिटुरेट (बेरेनिल) - 3-7 mg/kg, IM, जरूरत पर 2-3 दिन बाद दोहराएं
  • आइसोमेटामिडियम क्लोराइड - 0.5-1 mg/kg, IM, एकल खुराक
  • मेलार्सोप्रोल - गंभीर मामलों में, 2-3.6 mg/kg IV, सावधानी से
  • ब्रांड: Antrycide, Berenil, Samorin, Trypadim
  • नोट: सुरामीन पहली पसंद है, सबसे प्रभावी और सुरक्षित

२. एनीमिया के लिए उपचार:

  • आयरन डेक्सट्रान इंजेक्शन - 10-15 mg/kg, IM, साप्ताहिक 2-3 बार
  • विटामिन B12 (साइनोकोबालामिन) - 1000-2000 mcg, IM, साप्ताहिक
  • फोलिक एसिड - 5-10 mg, मुंह से, दैनिक
  • कोबाल्ट-कॉपर मिक्सचर - 10-20 ml, मुंह से, साप्ताहिक
  • ब्लड ट्रांसफ्यूजन - अत्यंत गंभीर एनीमिया में 4-6 लीटर
  • ब्रांड: Feritas, Neurobin, Hemocare

३. सहायक देखभाल दवाएं:

  • ग्लूकोज सैलाइन (5-10%) - 5-8 लीटर, IV, कमजोरी और निर्जलीकरण में
  • रिंगर लैक्टेट सॉल्यूशन - 4-6 लीटर, IV, दैनिक
  • कैल्शियम बोरोग्लूकोनेट (25%) - 200-400 ml, IV, धीरे-धीरे
  • डेक्सामेथासोन - 10-20 mg, IM, सूजन कम करने के लिए, 3 दिन
  • एंटीहिस्टामिन - एलर्जी से बचाव के लिए

४. विटामिन और टॉनिक:

  • विटामिन A, D, E इंजेक्शन - 15-20 ml, IM, साप्ताहिक
  • विटामिन C - 3-5 ग्राम, IV या मुंह से, दैनिक
  • लिवर टॉनिक (सिलीमेरिन) - 20-30 ml, मुंह से, दो बार दैनिक
  • मल्टीविटामिन पाउडर - 50 ग्राम, चारे में मिलाकर, दैनिक
  • ब्रांड: Virbac ADE, Livfit, Hepagen

५. बुखार और दर्द निवारक:

  • पैरासिटामोल - 10-15 mg/kg, मुंह से, हर 12 घंटे
  • फ्लूनिक्सिन मेग्लूमीन - 1.1 mg/kg, IV या IM, दैनिक
  • मेलोक्सिकैम - 0.5 mg/kg, मुंह से, दैनिक

६. प्रोफिलैक्सिस (बचाव के लिए दवा):

  • क्विनापाइरामीन सल्फेट - 3 mg/kg, IM, हर 3 महीने में (प्रकोप क्षेत्र में)
  • आइसोमेटामिडियम - 0.5 mg/kg, IM, हर 3-4 महीने
  • वर्षा ऋतु से पहले जरूर दें

तत्काल प्राथमिक देखभाल:

  • संक्रमित ऊँट को ठंडी छायादार जगह पर रखें
  • पूर्ण आराम दें, कोई काम न कराएं
  • हरा चारा, दलिया, गुड़ का पानी दें
  • साफ और ताजा पानी भरपूर दें
  • मक्खियों से बचाव करें
  • अन्य ऊँटों से अलग रखें

बचाव के उपाय:

  • प्रोफिलैक्टिक दवा: प्रकोप क्षेत्र में हर 3 महीने में क्विनापाइरामीन इंजेक्शन दें
  • मक्खी नियंत्रण - साइपरमेथ्रिन या डेल्टामेथ्रिन स्प्रे, साप्ताहिक
  • बाड़े में कीटनाशक छिड़काव, हर 15 दिन में
  • ऊँटों पर फ्लाई रिपेलेंट लगाएं
  • नए ऊँट खरीदने से पहले रक्त जांच करवाएं
  • संक्रमित ऊँट को तुरंत अलग करें और इलाज शुरू करें
  • सुई और उपकरणों को उबालकर या फिनाइल से साफ करें
  • जंगली जानवरों से दूर रखें
  • पानी के गड्ढे और नमी वाली जगह साफ रखें (मक्खियों का प्रजनन स्थल)
  • पौष्टिक आहार दें, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाएं

याद रखें: सुर्रा अत्यंत घातक रोग है। तेज बुखार, कमजोरी और सूजन के लक्षण दिखते ही तुरंत रक्त जांच करवाएं और उपचार शुरू करें। प्रकोप क्षेत्र में प्रोफिलैक्टिक दवा नियमित रूप से दें। मक्खी नियंत्रण सबसे महत्वपूर्ण बचाव है।

निमोनिया (Pneumonia) – ऊँट

बीमारी के बारे में:

निमोनिया ऊँटों की एक गंभीर श्वसन रोग है जिसमें फेफड़ों में संक्रमण और सूजन हो जाती है। यह रोग बैक्टीरिया, वायरस या सेकेंडरी संक्रमण के कारण होता है और समय पर इलाज न मिलने पर मृत्यु तक हो सकती है। ठंड, धूल, लंबी यात्रा और कमजोर प्रतिरक्षा इसके प्रमुख जोखिम कारक हैं।

लक्षण:

  • तेज बुखार (104–106°F)
  • तेज, कठिन या आवाज के साथ सांस लेना
  • नाक से पानी या मवाद निकलना
  • खांसी (सूखी या गीली)
  • भूख न लगना
  • सुस्ती और कमजोरी
  • लेटे रहना, चलने में अनिच्छा
  • होंठ या जीभ का नीला पड़ना (गंभीर अवस्था)
  • दूध उत्पादन में कमी

कारण:

  • बैक्टीरिया: Pasteurella, Mannheimia, Mycoplasma
  • वायरस: श्वसन वायरल संक्रमण
  • ठंडी हवा, बारिश, नमी
  • लंबी दूरी की यात्रा से तनाव
  • धूल भरा वातावरण
  • कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता
  • अन्य रोगों के बाद सेकेंडरी इन्फेक्शन

निदान:

  • क्लिनिकल लक्षणों के आधार पर
  • स्टेथोस्कोप से फेफड़ों की जांच
  • रक्त जांच (CBC)
  • नाक स्राव का लैब टेस्ट
  • एक्स-रे / अल्ट्रासाउंड (यदि उपलब्ध)

उपचार और बचाव

⚠️ चेतावनी: निमोनिया एक जानलेवा रोग है। लक्षण दिखते ही इलाज शुरू करें। देरी जानलेवा हो सकती है।

दवाइयाँ और इलाज:

1. एंटीबायोटिक (मुख्य इलाज):

  • ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन (LA) – 20 mg/kg, IM, हर 72 घंटे, 3 खुराक
  • सेफ्टियोफर – 2–4 mg/kg, IM, 3–5 दिन
  • एनरोफ्लोक्सासिन – 5 mg/kg, IM, 5 दिन
  • टायलोसिन – 10 mg/kg, IM, 3–5 दिन
  • ब्रांड: Terramycin LA, Baytril, Excenel

2. बुखार और सूजन के लिए:

  • मेलॉक्सिकैम – 0.5 mg/kg, IM, रोज
  • फ्लुनिक्सिन मेग्लूमिन – 1.1 mg/kg, IM
  • पैरासिटामोल – सहायक रूप में

3. सांस में राहत के लिए:

  • ब्रोंकोडायलेटर सिरप
  • स्टीम थेरेपी – दिन में 2 बार
  • नेब्युलाइजेशन (यदि सुविधा हो)

4. सपोर्टिव थेरेपी:

  • IV फ्लूइड (डिहाइड्रेशन में)
  • विटामिन B-कॉम्प्लेक्स
  • विटामिन A, D, E
  • मल्टीविटामिन-मिनरल

बचाव के उपाय:

  • ठंडी हवा और बारिश से बचाएं
  • लंबी यात्रा के बाद आराम दें
  • धूल-रहित और हवादार बाड़ा
  • पौष्टिक आहार और साफ पानी
  • कमजोर ऊँटों पर विशेष निगरानी
  • समय पर इलाज और पूरा कोर्स

याद रखें: निमोनिया में अधूरा इलाज सबसे बड़ा खतरा है। एंटीबायोटिक कोर्स पूरा करें, भले ही ऊँट 2–3 दिन में ठीक दिखने लगे।

आंत्र विषाक्तता (एंटरोटॉक्सीमिया) - ऊँट

बीमारी के बारे में:

आंत्र विषाक्तता ऊँटों की एक अत्यंत घातक बीमारी है जो क्लोस्ट्रिडियम परफ्रिंजेंस नामक बैक्टीरिया के विषाक्त पदार्थों से होती है। यह बैक्टीरिया आंतों में तेजी से बढ़कर जहरीले टॉक्सिन पैदा करता है जो पूरे शरीर में फैल जाता है। रोग बहुत तेज़ी से बढ़ता है और 12-24 घंटे में मृत्यु हो सकती है। मृत्यु दर 80-90% तक हो सकती है अगर समय पर इलाज न हो।

लक्षण:

  • अचानक मृत्यु (कभी-कभी बिना किसी लक्षण के)
  • तीव्र पेट दर्द और बेचैनी
  • पेट में तीव्र सूजन (गैस भरना)
  • खूनी या काले रंग का दस्त
  • तेज बुखार (104-106°F)
  • भूख और पानी पीना बंद हो जाना
  • गंभीर कमजोरी और लेटे रहना
  • सांस लेने में तकलीफ
  • पेट को छूने पर दर्द
  • मुंह से झाग निकलना
  • दांत पीसना और कराहना
  • आंखों में दर्द का भाव
  • अंतिम चरण में दौरे और बेहोशी

कारण:

  • क्लोस्ट्रिडियम परफ्रिंजेंस बैक्टीरिया (टाइप C और D मुख्य)
  • अचानक अधिक मात्रा में दाना या अनाज खिलाना
  • चारे में अचानक बदलाव
  • खराब या सड़ा हुआ चारा खाना
  • अधिक प्रोटीन या कार्बोहाइड्रेट वाला भोजन
  • लंबे समय तक भूखे रहने के बाद अधिक खाना
  • गीला या फफूंदी लगा चारा
  • मिट्टी में मौजूद बैक्टीरिया स्पोर
  • कमजोर रोग प्रतिरोधक क्षमता
  • तनाव और थकान

निदान:

  • नैदानिक लक्षणों की तेज़ी (अचानक बीमार होना)
  • पेट की सूजन और गैस की जांच
  • मृत्यु के बाद पोस्टमॉर्टम में आंतों की स्थिति
  • आंतों के तरल पदार्थ की प्रयोगशाला जांच
  • टॉक्सिन की पहचान (ELISA टेस्ट)
  • बैक्टीरिया कल्चर टेस्ट
  • रक्त जांच (गुर्दे और लीवर की क्षति)

उपचार और बचाव

⚠️ अति महत्वपूर्ण: यह एक आपातकालीन स्थिति है। लक्षण दिखते ही तुरंत पशु चिकित्सक को बुलाएं। कुछ घंटों की देरी जानलेवा हो सकती है। बचाव (टीकाकरण) ही सबसे बेहतर उपाय है।

दवाइयाँ और इलाज:

१. एंटीटॉक्सिन (मुख्य इलाज - सबसे जरूरी):

  • क्लोस्ट्रिडियल एंटीटॉक्सिन (पॉलीवेलेंट) - 100-200 ml, IV, धीरे-धीरे, तुरंत दें
  • टाइप C और D एंटीटॉक्सिन - 50-100 ml, IV या SC, जरूरत पर 12 घंटे बाद दोहराएं
  • नोट: जितनी जल्दी दें उतना बेहतर, यह विष को निष्क्रिय करता है
  • ब्रांड: Covexin, Enterovax, Clostrivax

२. एंटीबायोटिक्स (बैक्टीरिया को मारने के लिए):

  • पेनिसिलिन जी (क्रिस्टलीन) - 40,000-60,000 IU/kg, IV, हर 6 घंटे
  • पेनिसिलिन जी (प्रोकेन) - 20,000 IU/kg, IM, हर 12 घंटे, 5-7 दिन
  • ऑक्सीटेट्रासाइक्लिन (LA) - 20 mg/kg, IV, दिन में दो बार, 3-5 दिन
  • मेट्रोनिडाजोल - 15-25 mg/kg, IV या मुंह से, हर 12 घंटे, 5-7 दिन
  • एम्पिसिलिन - 10-20 mg/kg, IM या IV, हर 8 घंटे
  • ब्रांड: Crystapen, Terramycin, Flagyl, Ampiclox

३. गैस और पेट की सूजन कम करने के लिए:

  • ट्रोकार और कैनुला - पेट में डालकर गैस निकालें (पशु चिकित्सक द्वारा)
  • सिमेथिकोन (डाइमेथिकोन) - 100-200 ml, मुंह से, गैस तोड़ने के लिए
  • टर्पेंटाइन तेल - 50-100 ml, 500 ml तेल में मिलाकर, मुंह से
  • अदरक का रस - 100-150 ml, मुंह से
  • सोडियम बाईकार्बोनेट - 50-100 ग्राम, पानी में घोलकर

४. दर्द निवारक और एंटी-शॉक थेरेपी:

  • फ्लूनिक्सिन मेग्लूमीन - 1.1-2.2 mg/kg, IV, हर 12 घंटे
  • ब्यूटाइलस्कोपोलामीन - 0.3 mg/kg, IV या IM, पेट दर्द के लिए
  • डेक्सामेथासोन - 5-10 mg, IV, शॉक से बचाव, एक बार
  • मेटामिजोल (डिपायरोन) - 20-40 mg/kg, IV, दर्द और बुखार के लिए
  • ब्रांड: Finadyne, Buscopan, Novalgin

५. फ्लूइड थेरेपी (निर्जलीकरण और शॉक के लिए):

  • रिंगर लैक्टेट - 8-12 लीटर, IV, तेज़ी से (पहले 2-3 घंटे में)
  • सामान्य सैलाइन (0.9% NaCl) - 6-10 लीटर, IV, दैनिक
  • ग्लूकोज सैलाइन (5%) - 4-6 लीटर, IV, ऊर्जा के लिए
  • कैल्शियम बोरोग्लूकोनेट (25%) - 200-400 ml, IV, धीरे-धीरे
  • इलेक्ट्रोलाइट पाउडर - मुंह से पानी में घोलकर, अगर पी सकता है

६. आंत की गतिशीलता बढ़ाने के लिए:

  • नियोस्टिग्मिन - 5-10 mg, SC, सावधानी से (आंत में रुकावट न हो तो)
  • मेटोक्लोप्रामाइड - 0.5 mg/kg, IM या IV, हर 8 घंटे
  • खनिज तेल (Liquid Paraffin) - 2-4 लीटर, मुंह से, जहर को बाहर निकालने में मदद
  • अरंडी का तेल - 500 ml-1 लीटर, मुंह से

७. सहायक उपचार:

  • प्रोबायोटिक्स - 50-100 ग्राम, मुंह से, दो बार दैनिक, ठीक होने के बाद
  • विटामिन B-कॉम्प्लेक्स - 20-30 ml, IM, दैनिक, 5-7 दिन
  • विटामिन C - 3-5 ग्राम, IV, दैनिक
  • लिवर टॉनिक - 30-50 ml, मुंह से, दो बार दैनिक
  • ऑक्सीजन थेरेपी - अगर सांस लेने में तकलीफ हो

तत्काल प्राथमिक देखभाल:

  • तुरंत खाना-पानी बंद कर दें
  • ऊँट को खड़ा रखने की कोशिश करें, लेटने न दें
  • पेट की हल्की मालिश करें (अगर ऊँट सहन करे)
  • गर्म पानी की बोतल पेट पर रखें
  • तुरंत पशु चिकित्सक को बुलाएं
  • शांत और ठंडे स्थान पर रखें
  • अदरक का रस दे सकते हैं (अगर पी सकता है)

बचाव के उपाय (सबसे महत्वपूर्ण):

  • टीकाकरण (सबसे जरूरी): क्लोस्ट्रिडियल वैक्सीन (8-way या 10-way), साल में दो बार
  • बूस्टर डोज: पहली वैक्सीन के 3-4 सप्ताह बाद, फिर हर 6 महीने में
  • चारे में अचानक बदलाव न करें, धीरे-धीरे बदलें (7-10 दिन में)
  • अधिक मात्रा में दाना या अनाज एक बार में न दें
  • खराब, सड़ा या फफूंदी लगा चारा न दें
  • नियमित समय पर संतुलित भोजन दें
  • लंबे समय तक भूखा न रखें
  • ताजा और साफ पानी दें
  • तनाव और थकान से बचाएं
  • बाड़े में साफ-सफाई रखें
  • गर्भवती और दुधारू ऊँटों का विशेष ध्यान रखें
  • नए ऊँट लाने पर संगरोध अवधि रखें

याद रखें: आंत्र विषाक्तता बेहद घातक है और बहुत तेज़ी से बढ़ती है। बचाव (टीकाकरण) हज़ार गुना बेहतर है इलाज से। सभी ऊँटों को नियमित रूप से टीका लगवाएं। अचानक मृत्यु हो जाए तो पोस्टमॉर्टम जरूर करवाएं ताकि बाकी ऊँटों को बचाया जा सके। एक बार बीमारी हो जाए तो बचने की संभावना 10-20% ही होती है।

हमारी सेवाएं

प्रजनन सेवाएं

  • कृत्रिम गर्भाधान (बछिया होने की गारंटी के साथ)
  • बच्चा निकलना (प्रसव में सहायता)
  • जेर निकालना

शल्य चिकित्सा सेवाएं

  • सींग रोधन
  • टनक का सफल ऑपरेशन
  • झनक का सफल ऑपरेशन

रोग निरोधी सेवाएं (टीकाकरण)

  • मुंह और खुर की बीमारी (एफएमडी)
  • हेमोरेजिक सेप्टिसीमिया (एचएस)
  • ब्लैक क्वार्टर (बीक्यू)
  • पेस्ट डेस पेटिट्स रूमिनेंट्स (पीपीआर)
  • दाद और अन्य संक्रामक रोगों का टीकाकरण

अन्य सेवाएं

  • संक्रामक बीमारियों का इलाज
  • पशुओं की सामान्य चिकित्सा और उपचार
  • जीवाणु और वायरल बीमारियों का उपचार

ऑनलाइन परामर्श

परामर्श शुल्क: ₹500

24/7 उपलब्ध सेवा

परामर्श प्रक्रिया:

  1. 1.नीचे दिए गए नंबर पर फोन या व्हाट्सऐप करें
  2. 2.अपने पशु की समस्या बताएं
  3. 3.व्हाट्सऐप वीडियो कॉल पर पशु दिखाएं
  4. 4.डॉक्टर द्वारा भेजे गए पेमेंट लिंक से ₹500 का भुगतान करें
  5. 5.भुगतान के बाद आपको परचे की फोटो भेज दी जाएगी

नोट: आपातकालीन स्थिति में तुरंत नजदीकी पशु चिकित्सालय से संपर्क करें।

संपर्क विवरण

अश्विनी कुमार शुक्ला

पशु चिकित्सक

शुक्ला सदन, ग्रामः बैदौला-272189, सिद्धार्थनगर, उत्तर प्रदेश, भारत।